FCRA Amendment Bill 2026: एफसीआरएफ बिल से ‘राष्ट्र विरोधी गतिविधियों’ पर लगेगी रोक

Devendra Fadnavis : FCRA संशोधन विधेयक को लेकर विवाद के बीच देवेंद्र फडणवीस ने कहा कि कानून किसी धर्म या समुदाय के खिलाफ नहीं है। उन्होंने विदेशी फंड के दुरुपयोग पर रोक को जरूरी बताया। वहीं ईसाई संगठनों ने प्रस्तावित बदलावों पर चिंता जताई है।
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फडणवीस ने ईसाई विरोधी होने के आरोप को किया खारिज
FCRA Amendment Bill 2026: विदेशी चंदे को लेकर केंद्र सरकार के प्रस्तावित एफसीआरएफ संशोधन विधेयक पर देश में राजनीतिक और सामाजिक बहस तेज हो गई है। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने सोमवार को इसका बचाव करते हुए कहा कि विदेशी अंशदान के नियमों को कड़ा करने का मकसद किसी धर्म या समुदाय को निशाना बनाना नहीं, बल्कि विदेशी धन के संभावित दुरुपयोग और राष्ट्रविरोधी गतिविधियों पर रोक लगाना है। उन्होंने कांग्रेस के उस आरोप को खारिज किया कि प्रस्तावित कानून ईसाई संगठनों के खिलाफ है।
फडणवीस का कहना है कि एफसीआरएफ किसी एक धर्म के लिए नहीं है। विदेश से आर्थिक सहायता लेने वाले सभी संगठनों को इसके नियमों का पालन करना होता है। उनके मुताबिक जो संस्थाएं पारदर्शिता के साथ वैध सामाजिक, धार्मिक, शैक्षणिक या जनकल्याणकारी काम कर रही हैं, उन्हें नए प्रावधानों से परेशानी नहीं होनी चाहिए। यह तर्क केंद्र सरकार की आधिकारिक व्याख्या से भी काफी हद तक मेल खाता है। गृह मंत्रालय का कहना है कि एफसीआरएफ का उद्देश्य विदेशी योगदान को इस तरह नियंत्रित करना है कि उसका इस्तेमाल राष्ट्रीय हित के प्रतिकूल गतिविधियों के लिए न हो।
असल विवाद क्या है?
- सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि एफसीआरएफ अमेंडमेंट बिल, 2026 और एफसीआरएफ रूल्स, 2026 अलग-अलग चीजें हैं। संशोधन विधेयक 25 मार्च 2026 को लोकसभा में पेश किया गया था और अभी संसद के विचाराधीन है।
- इसके विपरीत संशोधित नियम 22 जून को अधिसूचित किए जा चुके हैं और लागू हैं। प्रस्तावित विधेयक में सबसे महत्वपूर्ण बदलाव एफसीआरएफ पंजीकरण समाप्त होने के बाद विदेशी अंशदान से बनी संपत्तियों के प्रबंधन से जुड़ा है।
- यदि किसी संगठन का एफसीआरएफ प्रमाणपत्र रद्द हो जाता है, संगठन उसे सरेंडर करता है या उसका नवीनीकरण नहीं होता, तो ऐसी स्थिति में संपत्तियों की निगरानी और प्रबंधन के लिए एक डेजिगनेटेड अथॉरिटी बनाने का प्रस्ताव है। कुछ परिस्थितियों में संपत्ति का स्थायी हस्तांतरण भी हो सकता है। हालांकि विधेयक में न्यायिक अपील का प्रावधान भी रखा गया है।
- सरकार का तर्क है कि मौजूदा कानून में एफसीआरएफ से जुड़ी संपत्तियों की स्थिति को लेकर व्यावहारिक और कानूनी खामियां हैं। नए विधेयक का उद्देश्य इन्हीं खामियों को दूर करना है। सरकार यह भी कह रही है कि विदेशी फंड लेने वाली संस्थाओं को अधिक जवाबदेह और पारदर्शी बनाना राष्ट्रीय हित में है।
नए नियमों में क्या बदला?
22 जून को लागू हुए संशोधित नियमों में एनजीओ और अन्य एफसीआरएफ संस्थाओं के लिए अपने काम के सटीक उद्देश्य और राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों को स्पष्ट करना जरूरी किया गया है। पहले व्यापक श्रेणियों के आधार पर अनुमति की व्यवस्था थी, जबकि अब गतिविधियों को ज्यादा स्पष्ट और निगरानी योग्य बनाने की कोशिश की गई है। सरकार के मुताबिक धार्मिक गतिविधियों को पूरी तरह प्रतिबंधित नहीं किया गया है। संशोधित नियमों में धार्मिक उद्देश्यों की कई श्रेणियां स्पष्ट रूप से सूचीबद्ध हैं, जिनमें पूजा स्थलों का रखरखाव, धार्मिक शिक्षा, नैतिक शिक्षा, ध्यान और धार्मिक परंपराओं के संरक्षण जैसी गतिविधियां शामिल हैं। हालांकि प्रॉसलीटाइजेशन यानी धर्म परिवर्तन के लिए प्रचार-प्रसार को पात्र गतिविधियों से बाहर रखा गया है। यही प्रावधान विवाद का बड़ा कारण बना हुआ है।
ईसाई संगठनों की आपत्ति क्यों?
कैथोलिक बिशप्स कॉन्फ्रेंस ऑफ इंडिया (सीबीसीआई) ने विधेयक को लेकर गंभीर चिंता जताई है। संगठन का कहना है कि देश में चर्च और ईसाई संस्थाएं शिक्षा, स्वास्थ्य, गरीबों की मदद, ग्रामीण विकास और आपदा राहत जैसे क्षेत्रों में लंबे समय से काम करती रही हैं। उनका डर है कि नए नियम और प्रस्तावित कानून इन संस्थाओं के कामकाज को प्रभावित कर सकते हैं। सीबीसीआई ने सरकार से व्यापक विचार-विमर्श के बाद विधेयक को दोबारा तैयार करने की मांग की है। जुलाई में सीबीसीआई के प्रतिनिधिमंडल ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात कर अपनी आपत्तियां रखी थीं। रिपोर्टों के मुताबिक इस मुलाकात में विधेयक के संभावित प्रभाव, धार्मिक स्वतंत्रता और विदेशी फंड से बनी संपत्तियों से जुड़े मुद्दे उठाए गए। विपक्ष भी विधेयक को लेकर सवाल उठा रहा है। कांग्रेस समेत कुछ दलों का आरोप है कि कड़े प्रावधानों का इस्तेमाल NGO और अल्पसंख्यक संस्थाओं पर दबाव बनाने के लिए किया जा सकता है। दूसरी तरफ सरकार का कहना है कि कानून धर्म देखकर नहीं, बल्कि एफसीआरएफ के तहत आने वाली सभी संस्थाओं पर समान रूप से लागू होगा।
क्या यह ‘ईसाई विरोधी’ कानून है?
FCRA Amendment Bill 2026: यहीं सबसे ज्यादा सावधानी की जरूरत है। विधेयक के उपलब्ध पाठ में किसी एक धर्म या समुदाय का नाम लेकर प्रतिबंध लगाने का प्रावधान नहीं है। इसका दायरा एफसीआरएफ के तहत आने वाले सभी संगठनों पर है। इसलिए इसे सीधे तौर पर “ईसाई विरोधी कानून” कहना विधायी पाठ से साबित नहीं होता। लेकिन दूसरी तरफ ईसाई संगठनों की चिंता को भी केवल राजनीतिक आरोप कहकर खारिज करना उचित नहीं होगा। विदेशी फंड पर निर्भर स्कूल, अस्पताल, राहत संस्थाएं और सामाजिक संगठन यदि नए अनुपालन नियमों के कारण अपना काम प्रभावित होता देखते हैं, तो उनके लिए संपत्ति और पंजीकरण से जुड़े प्रावधान गंभीर विषय हैं। खासकर उस स्थिति में जब किसी संस्था का एफसीआरएफ लाइसेंस रद्द या समाप्त हो जाए।
नियम, समान अनुपालन और पारदर्शी जांच जरूरी
- मामले का मूल सवाल धर्म नहीं, जवाबदेही और अधिकारों के संतुलन का है। विदेशी धन का इस्तेमाल यदि वास्तव में गैरकानूनी या राष्ट्रविरोधी गतिविधियों में होता है, तो सरकार के पास उसकी जांच और कार्रवाई के पर्याप्त अधिकार होने चाहिए। देश की सुरक्षा और वित्तीय पारदर्शिता से समझौता नहीं किया जा सकता।
- लेकिन दूसरी ओर, हर विदेशी फंड लेने वाली संस्था को संदेह की नजर से देखना भी उचित नहीं है। हजारों संगठन शिक्षा, स्वास्थ्य, गरीबी उन्मूलन और राहत कार्यों में विदेशी सहायता का इस्तेमाल करते हैं। इसलिए नियम जितने कड़े हों, उनकी प्रक्रिया उतनी ही स्पष्ट, पारदर्शी और न्यायसंगत होनी चाहिए।
- सबसे अहम बात यह है कि एफसीआरएफ अमेंडमेंट बिल अभी संसद में पारित नहीं हुआ है। इसलिए उसके अंतिम प्रभाव पर फैसला अभी से सुनाना जल्दबाजी होगी। संसद में विस्तृत बहस, हितधारकों की आपत्तियों पर विचार और न्यायिक समीक्षा की गुंजाइश ही तय करेगी कि नया ढांचा राष्ट्रीय सुरक्षा और नागरिक समाज की स्वतंत्रता के बीच कितना संतुलन बना पाता है।
- फिलहाल इतना स्पष्ट है कि एफसीआरएफ को लेकर सरकार और ईसाई संगठनों के बीच भरोसे का सवाल खड़ा हो चुका है। इस विवाद का सबसे बेहतर समाधान आरोप-प्रत्यारोप नहीं, बल्कि साफ नियम, समान अनुपालन और पारदर्शी जांच होगा।

