Jharkhand High Court: झारखंड की न्यायिक व्यवस्था को शुक्रवार को नया नेतृत्व मिल गया। राज्य के उच्च न्यायालय की जिम्मेदारी अब जस्टिस महेश शरदचंद्र सोनक के कंधों पर है। लोकभवन स्थित बिरसा मुंडा मंडप में आयोजित भव्य समारोह में राज्यपाल संतोष गंगवार ने उन्हें पद और गोपनीयता की शपथ दिलाई। इस मौके पर मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन, झारखंड हाईकोर्ट के वरिष्ठ न्यायाधीश, महाधिवक्ता, राज्य बार काउंसिल के पदाधिकारी, प्रशासनिक अधिकारी और मंत्रिमंडल के कई सदस्य उपस्थित रहे।
झारखंड की न्यायपालिका में नया अध्याय
जस्टिस महेश शरदचंद्र सोनक की नियुक्ति को झारखंड हाईकोर्ट के लिए एक नए अध्याय की शुरुआत के रूप में देखा जा रहा है। राज्य में न्यायिक लंबित मामलों की संख्या, त्वरित न्याय की अपेक्षा और संवेदनशील सामाजिक मुद्दों पर न्यायालय की भूमिका लगातार चर्चा में रही है। ऐसे समय में उनका अनुभव और न्यायिक दृष्टिकोण हाईकोर्ट को नई दिशा दे सकता है।
तीन दशकों से अधिक का समृद्ध विधिक अनुभव
जस्टिस सोनक ने अपने विधिक करियर की शुरुआत वर्ष 1988 में महाराष्ट्र और गोवा बार काउंसिल से की थी। बॉम्बे हाईकोर्ट की पणजी पीठ में उन्होंने सिविल, संवैधानिक, श्रम, सेवा, पर्यावरण और कर कानून जैसे विविध क्षेत्रों में व्यापक प्रैक्टिस की। यह बहुआयामी अनुभव उन्हें जटिल मामलों में संतुलित निर्णय लेने में सक्षम बनाता है।
न्यायाधीश के रूप में मजबूत पहचान
21 जून 2013 को जस्टिस सोनक को बॉम्बे हाईकोर्ट का अतिरिक्त न्यायाधीश नियुक्त किया गया था। इसके बाद उन्होंने कई महत्वपूर्ण मामलों में निर्णय देकर अपनी स्पष्ट सोच और कानून की गहरी समझ का परिचय दिया। उनके फैसलों में संवैधानिक मर्यादा के साथ-साथ मानवीय दृष्टिकोण भी दिखाई देता रहा है।
झारखंड के लिए क्यों अहम है यह नियुक्ति
झारखंड जैसे राज्य में न्यायपालिका की भूमिका केवल कानूनी विवादों तक सीमित नहीं है। यहां आदिवासी अधिकार, भूमि अधिग्रहण, खनन परियोजनाएं, पर्यावरण संरक्षण और प्रशासनिक जवाबदेही जैसे मुद्दे न्यायिक हस्तक्षेप की मांग करते रहे हैं। ऐसे में जस्टिस सोनक का अनुभव और पर्यावरण व संवैधानिक कानून की समझ राज्य के लिए विशेष महत्व रखती है।
28 नवंबर 2026 तक रहेगा कार्यकाल
गोवा के पणजी में जन्मे जस्टिस सोनक का कार्यकाल 28 नवंबर 2026 तक रहेगा। इस अवधि में उनसे अपेक्षा की जा रही है कि वे न केवल लंबित मामलों के निपटारे की गति बढ़ाएंगे, बल्कि न्यायिक प्रक्रियाओं में पारदर्शिता और विश्वास को भी मजबूत करेंगे।