Harish Rana Funeral: एक लंबा इंतजार, अनगिनत उम्मीदें और आखिरकार एक शांत विदाई. 13 साल तक कोमा में जिंदगी से जूझते रहे हरीश राणा को आज बुधवार की सुबह अंतिम विदाई दे दी गई। दिल्ली के ग्रीन पार्क में सुबह उनका अंतिम संस्कार किया गया, जहां हरीश को अंतिम विदाई देते हुए परिवार और करीबियों की आंखें नम हो गयी।
सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला- इच्छामृत्यु
मालूम हो 11 मार्च 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए हरीश राणा को इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी.13 वर्षों तक इलाज और उम्मीद के बाद जब कोई सुधार नहीं हुआ, तो परिवार ने यह कठिन निर्णय लिया। इसके बाद 14 मार्च को उन्हें एम्स, दिल्ली में भर्ती कराया गया, जहां डॉक्टरों की निगरानी में चरणबद्ध तरीके से लाइफ सपोर्ट हटाया गया, ताकि उन्हें बिना किसी पीड़ा के शांतिपूर्ण विदाई मिल सके। कल मंगलवार की शाम करीब 4 बजे हरीश ने दुनिया को अलविदा कह दिया था.
😢 नम आंखों में समंदर, हरिश राणा को अंतिम विदाई
अंतिम विदाई के वक्त मां-बाप का दर्द छलक पड़ा…
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— PRIYA RANA (@priyarana3101) March 25, 2026
पिता का भावुक संदेश
अंतिम विदाई की खबर खुद उनके पिता अशोक राणा ने सोसाइटी के व्हाट्सऐप ग्रुप में साझा की। उनका छोटा-सा संदेश—“सुबह 9 बजे पार्थिव शरीर का अंतिम संस्कार… ॐ शांति”—पढ़कर हर किसी की आंखें भर आईं। इन कुछ शब्दों में 13 साल का दर्द, संघर्ष और एक पिता का टूटता दिल साफ महसूस हो रहा था।
परिवार में शोक की लहर
उनके घर और सोसाइटी में शोक का माहौल है। गाजियाबाद के राजनगर एक्सटेंशन में रहने वाले लोग बताते हैं कि हरीश का परिवार इन सालों में चुपचाप एक लंबी लड़ाई लड़ता रहा। उनके भाई ने दिन-रात उनकी देखभाल की, और परिवार ने कभी उम्मीद नहीं छोड़ी।
एक हादसे ने बदल दी हरीश की जिंदगी
हरीश की जिंदगी 2013 में उस हादसे के बाद जैसे थम सी गई थी, जब वह हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिर गए थे। सिर में गंभीर चोट के बाद वे कोमा में चले गए और फिर कभी होश में नहीं लौट सके। बीते 13 साल उनके परिवार के लिए उम्मीद और दर्द के बीच झूलते रहे। हर दिन एक नई उम्मीद के साथ शुरू होता, लेकिन रात फिर उसी खामोशी में खत्म हो जाती।
परिवार ने किये हर संभव प्रयास
हरीश के अंतिम संस्कार में शामिल लोगों ने बताया कि परिवार ने हर संभव कोशिश की थी। इलाज, दुआएं, उम्मीद कुछ भी बाकी नहीं छोड़ा गया। लेकिन जब हालात में कोई सुधार नहीं हुआ, तो आखिरकार एक कठिन फैसला लेना पड़ा। यह फैसला सिर्फ चिकित्सा नहीं, बल्कि बेटे को पीड़ा से मुक्ति देने का था।