Rashtra Bharat Logo

“फांसी या लीथल इंजेक्शन: सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र से पूछा — क्या समय के साथ दंड की पद्धति नहीं बदलनी चाहिए?”

“फांसी या लीथल इंजेक्शन: सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र से पूछा — क्या समय के साथ दंड की पद्धति नहीं बदलनी चाहिए?”
Lethal Injection vs Hanging – सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से पूछा, क्यों नहीं बदलते समय के साथ दंड की विधि?
Updated:
·by
Asfi Shadab
Asfi Shadab
Share:

विषयसूची

मानवीय दंड की मांग पर सर्वोच्च न्यायालय में गूंजती बहस

नई दिल्ली। सर्वोच्च न्यायालय में इस समय एक अत्यंत संवेदनशील और नैतिक प्रश्न पर बहस जारी है—क्या भारत में मृत्युदंड पाए कैदियों को फांसी की बजाय लीथल इंजेक्शन (घातक इंजेक्शन) का विकल्प दिया जाना चाहिए? इस प्रश्न ने न्यायालय और सरकार दोनों के सामने एक नैतिक व संवैधानिक विमर्श खड़ा कर दिया है।

याचिकाकर्ता की ओर से यह मांग की गई है कि फांसी की प्रक्रिया न केवल अमानवीय है बल्कि संविधान के अनुच्छेद 21 के अंतर्गत जीवन और सम्मानजनक मृत्यु के अधिकार का भी उल्लंघन करती है। अदालत ने इस पर केंद्र सरकार से तीखे प्रश्न पूछते हुए कहा कि “जब समय और तकनीक बदल चुके हैं, तो फिर सरकार दंड की पुरानी पद्धति पर ही क्यों अटकी हुई है?”


केंद्र सरकार के रुख पर सर्वोच्च न्यायालय की सख़्त टिप्पणी

न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की द्विसदस्यीय पीठ ने केंद्र सरकार की उस दलील पर असहमति जताई, जिसमें उसने कहा था कि लीथल इंजेक्शन का विकल्प “व्यावहारिक रूप से संभव नहीं” है।

पीठ ने कहा, “समस्या यही है कि सरकार पुरानी परंपराओं से बाहर नहीं निकलना चाहती। जबकि संसार के अधिकांश देश अब फांसी को मानवीय दंड नहीं मानते। भारत को भी यह सोचना चाहिए कि क्या यह प्रक्रिया न्यायसंगत और आधुनिक समाज के अनुरूप है।”

सरकार की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता सोनिया माथुर ने कहा कि “ऐसे विकल्पों को अपनाना नीति निर्माण का विषय है, और यह न्यायपालिका के अधिकार क्षेत्र से बाहर है।” अदालत ने अगली सुनवाई 11 नवंबर तक स्थगित कर दी है, परंतु बहस ने राष्ट्रीय स्तर पर एक बार फिर ‘मानवीय मृत्यु’ के अधिकार को चर्चा के केंद्र में ला दिया है।


याचिकाकर्ता की दलील — ‘सम्मानजनक मृत्यु भी अधिकार का हिस्सा’

याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ऋषि मल्होत्रा ने कहा कि फांसी की प्रक्रिया एक लंबी, दर्दनाक और सार्वजनिक रूप से अपमानजनक विधि है। उन्होंने कहा, “सेना में लीथल इंजेक्शन का विकल्प पहले से मौजूद है। यदि सैन्य न्याय प्रणाली में यह संभव है, तो आम नागरिकों के लिए क्यों नहीं?”

उनका तर्क था कि फांसी द्वारा मृत्यु आने में कई बार 40 मिनट तक का समय लग जाता है, जिससे शरीर में अत्यधिक पीड़ा होती है। इसके विपरीत, इंजेक्शन से मृत्यु कुछ ही क्षणों में हो जाती है और कैदी को कष्ट नहीं झेलना पड़ता।


दुनिया के अनेक देशों में लीथल इंजेक्शन प्रचलित

याचिका में उल्लेख किया गया कि अमेरिका के 50 में से 49 राज्यों में मृत्युदंड लीथल इंजेक्शन के माध्यम से दिया जाता है। वहां इस प्रक्रिया को अधिक “मानवीय” और “वैज्ञानिक” माना गया है।

भारत में मृत्युदंड की प्रक्रिया दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 354(5) में निर्धारित है, जो कहती है कि “मृत्युदंड का क्रियान्वयन फांसी द्वारा किया जाएगा।” याचिकाकर्ता ने इसे भेदभावपूर्ण बताया और कहा कि यह अनुच्छेद 21 के उस मूल भाव के विपरीत है, जो “जीवन के साथ गरिमा” की बात करता है।


‘समय के साथ परिवर्तन न्याय की आत्मा है’ — विशेषज्ञों की राय

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि न्याय व्यवस्था को समय के साथ विकसित होना चाहिए। संविधान के निर्माता डॉ. भीमराव आंबेडकर ने भी कहा था कि “कोई भी विधि स्थायी नहीं हो सकती; उसे समाज के विकास के अनुरूप ढलना पड़ता है।”

वरिष्ठ विधि विश्लेषक प्रो. राजीव आनंद के अनुसार, “भारत में फांसी को केवल प्रतिशोध का प्रतीक नहीं, बल्कि निवारक के रूप में देखा जाता है। लेकिन यदि वही उद्देश्य कम पीड़ा देने वाले तरीकों से पूरा किया जा सकता है, तो सरकार को बदलाव से परहेज़ नहीं करना चाहिए।”


आने वाले समय में क्या हो सकता है निर्णय?

सर्वोच्च न्यायालय ने संकेत दिया है कि वह इस मामले को केवल नीतिगत प्रश्न तक सीमित नहीं मानता, बल्कि इसे मानवाधिकार और संवैधानिक नैतिकता के परिप्रेक्ष्य में देख रहा है। यदि अदालत यह मान लेती है कि सम्मानजनक मृत्यु का अधिकार अनुच्छेद 21 के तहत संरक्षित है, तो भारत में मृत्युदंड की विधि में एक ऐतिहासिक परिवर्तन संभव है।

अगली सुनवाई में केंद्र को यह स्पष्ट करना होगा कि क्या वह वैश्विक मानकों के अनुरूप भारत की दंड व्यवस्था में सुधार को तैयार है या नहीं।


निष्कर्ष — कानून, करुणा और आधुनिकता का संतुलन

यह मामला केवल मृत्युदंड की विधि का नहीं, बल्कि भारत की न्याय प्रणाली के मानवीय दृष्टिकोण का प्रतीक है। यदि फांसी की जगह लीथल इंजेक्शन को अपनाया जाता है, तो यह न केवल कैदियों के प्रति दया का भाव दर्शाएगा, बल्कि न्याय के आधुनिक और संवेदनशील स्वरूप की भी पुष्टि करेगा।


Rashtra Bharat
Rashtra Bharat पर पढ़ें ताज़ा खेल, राजनीति, विश्व, मनोरंजन, धर्म और बिज़नेस की अपडेटेड हिंदी खबरें।

Asfi Shadab

Asfi Shadab

असफ़ी शादाब वरिष्ठ पत्रकार और संवाददाता हैं, जो राष्ट्र भारत में महाराष्ट्र और कोलकाता से क्राइम, राजनीति, खेल और सरकारी नीतियों से जुड़े विषयों की ग्राउंड रिपोर्टिंग करते हैं। उन्हें जमीनी पत्रकारिता, प्रशासनिक मामलों और समसामयिक घटनाक्रमों की गहरी समझ है। उनकी रिपोर्टिंग तथ्यपरक, शोध आधारित और आधिकारिक स्रोतों पर आधारित होती है, जिससे पाठकों को विश्वसनीय और स्पष्ट जानकारी प्राप्त होती है। अनुभव : पत्रकारिता के क्षेत्र में कार्य करते हुए उन्होंने महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल के विभिन्न क्षेत्रों से ग्राउंड-लेवल रिपोर्टिंग की है। प्रशासनिक कार्यवाहियों, सरकारी नीतियों, राजनीतिक घटनाक्रम और अपराध से जुड़े मामलों की फील्ड कवरेज उनकी प्रमुख पहचान रही है। वर्तमान भूमिका : राष्ट्र भारत में वरिष्ठ संवाददाता के रूप में वे क्राइम, राजनीति, खेल और सरकारी नीतियों से संबंधित खबरों की रिपोर्टिंग करते हैं। वे जमीनी सच्चाई को सरल और आम पाठक की भाषा में प्रस्तुत करने को प्राथमिकता देते हैं। भौगोलिक विशेषज्ञता : उनकी रिपोर्टिंग का मुख्य फोकस महाराष्ट्र और कोलकाता रहा है, जहां वे स्थानीय प्रशासन, राजनीतिक गतिविधियों, अपराध और खेल जगत से जुड़े विषयों को करीब से कवर करते हैं। उनकी क्षेत्रीय समझ और फील्ड अनुभव उनकी रिपोर्टिंग को अधिक प्रामाणिक बनाते हैं। मुख्य विशेषज्ञता (Core Expertise) : • क्राइम रिपोर्टिंग : अपराध, पुलिस जांच, प्रशासनिक कार्रवाई और कानून व्यवस्था से जुड़े मामलों की तथ्यपरक कवरेज। • राजनीति और शासन : सरकारी नीतियों, प्रशासनिक फैसलों और राजनीतिक घटनाक्रमों पर विश्लेषणात्मक रिपोर्टिंग। • खेल पत्रकारिता : खेल जगत की प्रमुख घटनाओं, खिलाड़ियों और प्रतियोगिताओं से जुड़े विषयों की रिपोर्टिंग। • ग्राउंड रिपोर्टिंग : फील्ड विजिट, स्थानीय स्रोतों और आधिकारिक जानकारी के आधार पर जमीनी सच्चाई सामने लाना। • जनहित पत्रकारिता : आम लोगों से जुड़े मुद्दों और प्रशासनिक प्रभावों को सरल एवं स्पष्ट भाषा में प्रस्तुत करना। विश्वसनीयता का आधार (Credibility Signal) : तथ्यों की सटीकता, आधिकारिक स्रोतों पर आधारित रिपोर्टिंग और जमीनी अनुभव ने असफ़ी शादाब को एक भरोसेमंद और प्रामाणिक पत्रकार के रूप में स्थापित किया है। क्राइम, राजनीति और प्रशासनिक विषयों पर उनकी निरंतर फील्ड रिपोर्टिंग पाठकों के बीच उनकी विश्वसनीयता को मजबूत बनाती है।