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मुंबई मेयर को लेकर सियासी खींचतान, शिंदे और बीजेपी के बीच नई जंग की सुगबुगाहट

शिंदे और बीजेपी के बीच नई जंग की सुगबुगाहट
शिंदे और बीजेपी के बीच नई जंग की सुगबुगाहट (Credit- AIR)

बीएमसी चुनाव नतीजों के बाद मुंबई में मेयर पद को लेकर सियासी खींचतान तेज हो गई है। बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी है, लेकिन बहुमत के लिए शिंदे गुट पर निर्भर है। शिंदे की बढ़ती ताकत और होटल राजनीति ने सत्ता समीकरणों को और रोचक बना दिया है।

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Mumbai Mayor: मुंबई महानगरपालिका के चुनाव परिणाम आते ही सियासी गलियारों में सरगर्मियां तेज हो गई हैं। देश की सबसे अमीर नगर निगम मानी जाने वाली बीएमसी की सत्ता हमेशा से राजनीतिक दलों के लिए प्रतिष्ठा का सवाल रही है। इस बार भी नतीजों के बाद तस्वीर पूरी तरह साफ नहीं हुई है, बल्कि मेयर की कुर्सी को लेकर सस्पेंस और सौदेबाजी दोनों ही चरम पर पहुंच गई हैं।

भारतीय जनता पार्टी ने इस चुनाव में पूरी ताकत झोंक दी थी। 89 सीटें जीतकर वह सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है, लेकिन बहुमत से अभी भी वह दूर है। ऐसे में सत्ता की असली चाबी मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के हाथों में नजर आ रही है। यही वजह है कि अब सारी निगाहें शिंदे की अगली चाल पर टिकी हुई हैं।

बीजेपी का सपना और अधूरी जीत

बीजेपी ने इस बार साफ ऐलान किया था कि किसी भी कीमत पर मुंबई में उसका मेयर बनेगा। पार्टी ने चुनाव प्रचार से लेकर रणनीति तक हर स्तर पर आक्रामक रुख अपनाया। नतीजों में 89 सीटें मिलना बड़ी सफलता जरूर है, लेकिन बीएमसी में बहुमत के लिए जरूरी 114 सीटों का आंकड़ा अभी भी दूर है।

बीजेपी जानती है कि अकेले दम पर सत्ता हासिल करना संभव नहीं है। ऐसे में सहयोगी दलों पर उसकी निर्भरता बढ़ जाती है। यही वह स्थिति है, जहां राजनीति के समीकरण बदलने लगते हैं और सौदेबाजी की गुंजाइश पैदा होती है।

शिंदे गुट की बढ़ी ताकत

शिंदे सेना को इस चुनाव में 29 सीटें मिली हैं। संख्या भले ही बीजेपी से कम हो, लेकिन इन सीटों का महत्व कहीं ज्यादा है। बीजेपी और शिंदे गुट मिलकर ही बहुमत का आंकड़ा पार कर सकते हैं। इस गणित ने शिंदे को मजबूत स्थिति में ला खड़ा किया है।

सूत्रों के मुताबिक, शिंदे गुट इस मौके को सिर्फ समर्थन तक सीमित नहीं रखना चाहता। खबर है कि शिंदे सेना मुंबई के मेयर पद पर अपना दावा ठोक सकती है। तर्क के तौर पर बालासाहेब ठाकरे के जन्मशताब्दी वर्ष का हवाला दिया जा रहा है। शिंदे गुट का मानना है कि यह समय उनकी राजनीतिक पहचान को और मजबूत करने का है।

ढाई साल का फार्मूला और बड़ी मांग

राजनीतिक चर्चाओं में यह बात तेजी से घूम रही है कि शिंदे गुट बीजेपी से ढाई साल के लिए मेयर पद की मांग कर सकता है। इसके अलावा स्थायी समिति के अध्यक्ष पद और अन्य अहम पदों पर भी दावा किया जा सकता है।

यह मांग बीजेपी के लिए आसान नहीं है। एक ओर पार्टी को मुंबई में सत्ता चाहिए, तो दूसरी ओर उसे अपने सबसे बड़े नगर निगम में नेतृत्व छोड़ने का जोखिम भी है। यही दुविधा इस पूरे राजनीतिक ड्रामे को और दिलचस्प बना रही है।

होटल राजनीति से बढ़ा दबाव

सियासी समीकरणों के बीच एकनाथ शिंदे का एक कदम खास चर्चा में है। उन्होंने अपने सभी 29 नवनिर्वाचित पार्षदों को बांद्रा के ताज लैंड्स एंड होटल में ठहराया है। सत्ता गठन की प्रक्रिया पूरी होने तक सभी पार्षद वहीं रहेंगे।

इस कदम को राजनीतिक हलकों में दबाव की रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है। होटल में पार्षदों को एकजुट रखना न सिर्फ टूट-फूट की आशंका को कम करता है, बल्कि सहयोगी दलों को यह संदेश भी देता है कि शिंदे गुट पूरी तरह संगठित है।

फडणवीस का बयान और भरोसे की कोशिश

मेयर पद को लेकर चल रही खींचतान पर उपमुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस का बयान भी सामने आया है। उन्होंने कहा कि महायुति को पूर्ण बहुमत मिला है और मुंबई में मेयर भी महायुति का ही बनेगा। फडणवीस ने यह भी भरोसा दिलाया कि शिंदे के साथ बैठकर सभी मुद्दों का समाधान निकाला जाएगा।

होटल में पार्षदों को रखने के सवाल पर उन्होंने इसे सामान्य प्रक्रिया बताया और कहा कि तोड़-फोड़ की राजनीति की अब जरूरत नहीं है। यह बयान भले ही सुलह का संकेत दे, लेकिन अंदरखाने की राजनीति इससे कहीं ज्यादा जटिल मानी जा रही है।

मुंबई की सत्ता क्यों है इतनी अहम

बीएमसी सिर्फ एक नगर निगम नहीं है, बल्कि मुंबई की आर्थिक और प्रशासनिक धुरी है। इसका बजट कई राज्यों से भी बड़ा होता है। ऐसे में यहां सत्ता पर काबिज होना किसी भी दल के लिए बड़ी उपलब्धि मानी जाती है।

मुंबई का मेयर बनना सिर्फ प्रशासनिक पद नहीं, बल्कि राजनीतिक संदेश भी देता है। यही वजह है कि बीजेपी और शिंदे गुट दोनों ही इस मौके को हाथ से जाने नहीं देना चाहते।

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Dipali Kumari

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