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अमेरिकी दबाव के बावजूद भारत ने रूस से तेल खरीद में की बढ़ोतरी, नवंबर में पांच महीने का रिकॉर्ड

India Russia Oil Import: अमेरिकी प्रतिबंधों के बीच भारत ने बढ़ाई रूसी तेल की खरीद
India Russia Oil Import: अमेरिकी प्रतिबंधों के बीच भारत ने बढ़ाई रूसी तेल की खरीद (File Photo)

अमेरिकी प्रतिबंधों के बावजूद भारत का रूस से तेल आयात नवंबर में 4% बढ़कर 2.6 अरब यूरो तक पहुंच गया। सीआरईए की रिपोर्ट के अनुसार निजी कंपनियों की खरीद घटी लेकिन सरकारी तेल कंपनियों ने 22% वृद्धि की। रूस भारत के कुल तेल आयात का 35% आपूर्तिकर्ता बना हुआ है।

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दुनिया की बड़ी ताकतों के बीच चल रही आर्थिक जंग में भारत ने एक बार फिर अपना स्वतंत्र रुख साबित किया है। अमेरिका की तरफ से लगातार दबाव बनाए जाने और तमाम तरह के प्रतिबंधों के बावजूद भारत ने रूस से कच्चे तेल की खरीद में इजाफा किया है। नवंबर महीने में यह खरीद पिछले पांच महीनों के मुकाबले सबसे ज्यादा रही है।

यूरोप की एक शोध संस्था ‘सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर’ यानी सीआरईए ने शुक्रवार को जारी अपनी रिपोर्ट में बताया कि भारत का रूस से कच्चे तेल का आयात नवंबर में 4 प्रतिशत बढ़कर 2.6 अरब यूरो तक पहुंच गया। यह आंकड़ा बीते पांच महीनों में सबसे ज्यादा है। इससे पहले अक्टूबर में भारत ने रूस से 2.5 अरब यूरो का कच्चा तेल खरीदा था।

दुनिया में भारत की स्थिति

सीआरईए की रिपोर्ट के अनुसार रूसी कच्चे तेल के मामले में भारत नवंबर में चीन के बाद दूसरा सबसे बड़ा खरीदार रहा। आंकड़ों पर नजर डालें तो नवंबर में रूस ने अपने कुल कच्चे तेल निर्यात का 47 प्रतिशत हिस्सा चीन को भेजा। वहीं 38 प्रतिशत हिस्सा भारत को निर्यात हुआ। बाकी खरीदारों में तुर्किये का हिस्सा 6 प्रतिशत और यूरोपीय संघ का भी 6 प्रतिशत रहा।

यह आंकड़े साफ तौर पर बताते हैं कि रूस के लिए भारत कितना अहम बाजार बन गया है। अमेरिकी प्रतिबंधों के बावजूद यह व्यापारिक रिश्ता मजबूती से कायम है।

आगे और बढ़ सकती है खरीद

सीआरईए के विश्लेषण के मुताबिक भारत का रूस से कच्चे तेल का आयात अक्टूबर की तुलना में चार प्रतिशत बढ़ा है जबकि कुल आयात की मात्रा लगभग स्थिर बनी रही। संस्था का अनुमान है कि दिसंबर में यह खरीद और भी बढ़ सकती है। इसकी वजह यह है कि रूसी तेल पर अमेरिकी प्रतिबंध लागू होने से पहले ही कई तेलवाहक जहाज रवाना हो चुके थे। इन जहाजों में भरा तेल दिसंबर में भारत पहुंचेगा।

यह रणनीति दिखाती है कि भारतीय तेल कंपनियां आने वाली चुनौतियों को पहले से भांप कर तैयारी कर रही हैं।

अमेरिकी प्रतिबंध और भारत पर दबाव

गौरतलब है कि अमेरिका ने रूसी तेल की खरीद का हवाला देते हुए भारत पर 50 फीसदी टैरिफ लगाने की धमकी दी थी। इसके बाद 22 अक्टूबर को अमेरिका ने रूस की दो बड़ी तेल कंपनियों रोसनेफ्ट और ल्यूकऑयल पर प्रतिबंध लगा दिए।

इन प्रतिबंधों का असर कुछ हद तक देखने को मिला। रिलायंस इंडस्ट्रीज, एचपीसीएल, एचपीसीएल-मित्तल एनर्जी और मैंगलोर रिफाइनरी एंड पेट्रोकेमिकल्स लिमिटेड जैसी निजी कंपनियों ने रूसी तेल का आयात अस्थायी रूप से रोक दिया। लेकिन यह पूरी कहानी नहीं है।

सरकारी कंपनियों ने संभाली जिम्मेदारी

जहां निजी तेल कंपनियों ने सावधानी बरतते हुए रूसी तेल की खरीद कम या बंद कर दी, वहीं सरकारी तेल कंपनियों ने इस कमी को पूरा करने की जिम्मेदारी उठाई। सीआरईए की रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि नवंबर में निजी तेल कंपनियों के आयात में हल्की गिरावट आई, लेकिन सरकारी तेल कंपनियों ने रूसी कच्चे तेल की खरीद 22 प्रतिशत बढ़ा दी।

इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन जैसी सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियां अब भी गैर-प्रतिबंधित रूसी आपूर्तिकर्ताओं से खरीद जारी रखे हुए हैं। यह रणनीति भारत की ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक हितों को ध्यान में रखते हुए अपनाई गई है।

यूक्रेन युद्ध के बाद बदली तस्वीर

दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक भारत 2022 में यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद रूस से रियायती दरों पर तेल खरीदने वाला सबसे बड़ा ग्राहक बन गया। युद्ध से पहले रूस से भारत के आयात में एक प्रतिशत से भी कम हिस्सा होता था। लेकिन युद्ध के बाद यह हिस्सा तेजी से बढ़कर भारत के कुल तेल आयात का लगभग 40 प्रतिशत तक पहुंच गया।

हालांकि इसके बाद कुछ महीनों में आंशिक गिरावट देखने को मिली, लेकिन नवंबर में रूस ने फिर से भारत की कुल कच्चे तेल आपूर्ति में 35 प्रतिशत का योगदान दिया। यह आंकड़ा बताता है कि रूसी तेल भारत की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने में कितना महत्वपूर्ण हो गया है।

रिफाइन कर निर्यात भी होता है ईंधन

भारत सिर्फ रूसी तेल खरीदकर घरेलू इस्तेमाल तक सीमित नहीं है। भारत इस आयातित कच्चे तेल को अपनी रिफाइनरियों में शुद्ध करके पेट्रोल, डीजल जैसे ईंधन बनाता है। इसका एक बड़ा हिस्सा घरेलू जरूरतों के लिए इस्तेमाल होता है और बाकी को निर्यात किया जाता है।

सीआरईए की रिपोर्ट के अनुसार नवंबर में भारत और तुर्किये की छह रिफाइनरियों ने 80.7 करोड़ यूरो मूल्य के रिफाइंड ईंधन का निर्यात किया। इसमें से 46.5 करोड़ यूरो का ईंधन यूरोपीय संघ को, 11 करोड़ यूरो का अमेरिका को, 5.1 करोड़ यूरो का ब्रिटेन को, 15 करोड़ यूरो का ऑस्ट्रेलिया को और 31 करोड़ यूरो का कनाडा को भेजा गया।

रूसी तेल से बने ईंधन की खरीद

दिलचस्प बात यह है कि इन निर्यात में से लगभग 30.1 करोड़ यूरो मूल्य के रिफाइंड तेल उत्पाद रूसी कच्चे तेल से ही बने थे। जहां यूरोपीय संघ ने रूसी कच्चे तेल से बने ईंधन पर प्रतिबंध लगा रखा है, वहीं ऑस्ट्रेलिया, कनाडा और अमेरिका ने अभी तक ऐसा कोई प्रतिबंध नहीं लगाया है।

यह स्थिति एक तरह से विरोधाभासी है। एक तरफ अमेरिका भारत पर रूसी तेल खरीदने के लिए दबाव बना रहा है, दूसरी तरफ उसी रूसी तेल से बने रिफाइंड उत्पाद अमेरिका खुद खरीद रहा है।

भारत का स्वतंत्र रुख

भारत सरकार ने साफ कर दिया है कि वह अपने राष्ट्रीय हितों को सर्वोपरि रखते हुए फैसले लेगी। अमेरिकी दबाव के बावजूद भारत ने रूस से तेल खरीद जारी रखी है। यह फैसला भारत की ऊर्जा सुरक्षा और आम जनता के हितों को ध्यान में रखते हुए लिया गया है।

रूसी तेल की खरीद से भारत को रियायती दरों पर तेल मिल रहा है, जिससे घरेलू बाजार में पेट्रोल-डीजल की कीमतों को नियंत्रित रखने में मदद मिलती है। साथ ही रिफाइंड उत्पादों के निर्यात से विदेशी मुद्रा भी कमाई जा रही है।

यह पूरा प्रकरण दिखाता है कि बदलते वैश्विक समीकरणों में भारत अपनी स्वतंत्र विदेश नीति और आर्थिक रणनीति के साथ आगे बढ़ रहा है।

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Asfi Shadab

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