आंकड़ों में छिपा बड़ा दर्द
Farmer Suicide Crisis in India 2024: भारत में खेती आज भी करोड़ों लोगों की जिंदगी का सहारा है, लेकिन यही खेती अब हजारों परिवारों के लिए संकट बनती जा रही है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो यानी एनसीआरबी की 2024 की रिपोर्ट एक बार फिर देश को झकझोरती है।
रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2024 में कृषि क्षेत्र से जुड़े 10,546 लोगों ने आत्महत्या की। इनमें किसान भी शामिल हैं और खेतिहर मजदूर भी। यह संख्या 2023 के 10,786 मामलों से थोड़ी कम जरूर है, लेकिन तस्वीर अब भी बेहद डरावनी है। इसका मतलब है कि देश में हर दिन औसतन 28 किसान या खेतिहर मजदूर अपनी जान दे रहे हैं। यानी लगभग हर घंटे एक व्यक्ति खेती से जुड़ी परेशानियों के आगे जिंदगी हार रहा है।
खेतिहर मजदूर सबसे ज्यादा टूट रहे हैं
Farmer Suicide Crisis in India 2024: एनसीआरबी के आंकड़े बताते हैं कि 2024 में देश में कुल 1,70,746 आत्महत्याएं दर्ज हुईं, जिनमें खेती से जुड़े लोगों की हिस्सेदारी 6.2 प्रतिशत रही। सबसे ज्यादा चिंता की बात यह है कि आत्महत्या करने वालों में खेतिहर मजदूरों की संख्या लगातार बढ़ रही है।
कुल 10,546 मामलों में 5,913 कृषि मजदूर थे, जबकि 4,633 किसान थे। यानी कुल मामलों में खेतिहर मजदूरों की हिस्सेदारी 56 प्रतिशत तक पहुंच गई है। यह सिर्फ आंकड़ा नहीं, बल्कि गांवों की बदलती आर्थिक हकीकत है, जहां खेती से ज्यादा लोग मजदूरी पर निर्भर होते जा रहे हैं।
गांवों में बढ़ती आर्थिक असुरक्षा
Farmer Suicide Crisis in India 2024: कुछ साल पहले तक खेती ग्रामीण परिवारों की मुख्य आय मानी जाती थी, लेकिन अब हालात तेजी से बदल रहे हैं। खेती से होने वाली कमाई लगातार अनिश्चित होती जा रही है। कभी मौसम की मार, कभी फसल खराब होने का डर, कभी बाजार में सही दाम न मिलना और ऊपर से बढ़ता कर्ज किसानों को लगातार दबाव में रखता है। दूसरी तरफ खेतिहर मजदूरों के पास स्थायी आय का कोई भरोसा नहीं होता। काम मिला तो कमाई हुई, नहीं मिला तो पूरा परिवार संकट में आ जाता है। यही आर्थिक असुरक्षा अब मानसिक तनाव को और गहरा कर रही है।
गिरावट के बावजूद खत्म नहीं हुआ संकट
Farmer Suicide Crisis in India 2024: अगर पिछले कुछ वर्षों के आंकड़ों को देखें तो 2022 में खेती से जुड़ी आत्महत्याओं का आंकड़ा 11,290 तक पहुंच गया था, जो हाल के वर्षों में सबसे ज्यादा था। उसके बाद 2023 और फिर 2024 में थोड़ी गिरावट जरूर दर्ज हुई है, लेकिन यह राहत की तस्वीर नहीं बनाती। क्योंकि संख्या अब भी 10 हजार से ऊपर बनी हुई है। इसका साफ मतलब है कि जमीन पर हालात में कोई बड़ा बदलाव नहीं आया है और खेती का संकट अब भी गहराई से मौजूद है।
महाराष्ट्र बना किसान आत्महत्याओं का केंद्र
Farmer Suicide Crisis in India 2024: राज्यों की बात करें तो महाराष्ट्र एक बार फिर सबसे ऊपर है। यहां 2024 में कृषि क्षेत्र से जुड़ी 3,824 आत्महत्याएं दर्ज की गईं। यह पूरे देश में खेती से जुड़ी आत्महत्याओं का करीब 36 प्रतिशत हिस्सा है। लंबे समय से विदर्भ और मराठवाड़ा जैसे इलाके किसान संकट का केंद्र रहे हैं। बारिश पर निर्भर खेती, सूखा, बढ़ती लागत और कर्ज ने छोटे किसानों की कमर तोड़ दी है। कई परिवार ऐसे हैं जिनके लिए खेती अब उम्मीद नहीं, बल्कि डर का कारण बन चुकी है।
कर्नाटक और मध्य प्रदेश में बढ़ी चिंता
Farmer Suicide Crisis in India 2024: महाराष्ट्र के बाद कर्नाटक में 2,971 मामले दर्ज हुए। इसके बाद मध्य प्रदेश में 835, आंध्र प्रदेश में 780, तमिलनाडु में 503 और छत्तीसगढ़ में 486 आत्महत्याएं दर्ज की गईं। सबसे ज्यादा चिंता कर्नाटक को लेकर सामने आई, जहां 2024 में खेती से जुड़ी आत्महत्याओं में 22.61 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज हुई। राजस्थान में 14 प्रतिशत और मध्य प्रदेश में 7.46 प्रतिशत की वृद्धि हुई। इसके उलट आंध्र प्रदेश में 15.67 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई। यह दिखाता है कि अलग-अलग राज्यों में हालात और सरकारी नीतियों का असर अलग-अलग तरीके से दिखाई दे रहा है।
छोटे राज्यों तक पहुंचा खेती का संकट
Farmer Suicide Crisis in India 2024: एक और चौंकाने वाली तस्वीर पुदुचेरी से सामने आई। यहां 2019 से 2022 तक खेती से जुड़ी आत्महत्या का एक भी मामला दर्ज नहीं हुआ था। लेकिन 2023 में 10 मामले सामने आए और 2024 में यह संख्या बढ़कर 33 हो गई। यानी सिर्फ एक साल में तीन गुना से ज्यादा बढ़ोतरी। यह संकेत देता है कि कृषि संकट अब छोटे राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों तक भी पहुंच रहा है।
सिर्फ आंकड़े नहीं, टूटते परिवारों की कहानी
Farmer Suicide Crisis in India 2024: किसान आत्महत्या का मुद्दा सिर्फ आंकड़ों तक सीमित नहीं है। इसके पीछे टूटते परिवार, अधूरे सपने और आर्थिक दबाव की लंबी कहानी छिपी होती है। कई किसान कर्ज, फसल नुकसान, पारिवारिक जिम्मेदारियों और भविष्य की चिंता के बीच खुद को अकेला महसूस करने लगते हैं। ऐसे में सिर्फ मुआवजा या कर्जमाफी काफी नहीं मानी जा सकती।
जरूरत इस बात की है कि खेती को आर्थिक रूप से सुरक्षित बनाया जाए, किसानों की आय स्थिर हो, मजदूरों को सामाजिक सुरक्षा मिले और गांवों में मानसिक स्वास्थ्य को लेकर भी गंभीर पहल हो। क्योंकि जब तक खेती सम्मानजनक और सुरक्षित आजीविका नहीं बनेगी, तब तक हर घंटे किसी न किसी किसान की जिंदगी इसी तरह बुझती रहेगी।