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सेना के जवानों के लिए नया नियम, सोशल मीडिया पर पोस्ट करने की पाबंदी, कमेंट पर भी रोक

सेना के जवानों के लिए नया नियम, सोशल मीडिया पर पोस्ट करने की पाबंदी, कमेंट पर भी रोक
सेना के जवानों के लिए नया नियम

भारतीय सेना ने सोशल मीडिया नीति में बदलाव करते हुए जवानों के लिए इंस्टाग्राम को केवल देखने तक सीमित कर दिया है। पोस्ट, लाइक और टिप्पणी पर रोक का उद्देश्य सूचना सुरक्षा, हनी ट्रैप से बचाव और डिजिटल अनुशासन को मजबूत करना है।

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Dipali Kumari
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Indian Army Social Media Policy: डिजिटल युग में सोशल मीडिया जीवन का अहम हिस्सा बन चुका है। आम नागरिकों से लेकर संस्थानों तक, हर कोई सूचना, संवाद और अभिव्यक्ति के लिए इन प्लेटफॉर्म्स का इस्तेमाल कर रहा है। लेकिन जब बात राष्ट्रीय सुरक्षा की हो, तो वही सोशल मीडिया एक बड़ी चुनौती भी बन जाता है। इसी चुनौती को ध्यान में रखते हुए भारतीय सेना ने सोशल मीडिया के उपयोग को लेकर अपनी नीति में एक अहम बदलाव किया है। अब सेना के जवान और अधिकारी इंस्टाग्राम का उपयोग केवल देखने और निगरानी के उद्देश्य से ही कर सकेंगे। वे न तो कोई पोस्ट कर पाएंगे और न ही किसी पोस्ट को लाइक या उस पर टिप्पणी कर सकेंगे।

सूत्रों के अनुसार, यह निर्देश सेना की सभी यूनिटों और विभागों को जारी कर दिए गए हैं। पहले से लागू डिजिटल गतिविधियों से जुड़े अन्य सभी नियम यथावत रहेंगे। इस फैसले के पीछे सेना की मंशा स्पष्ट है—सूचना की सुरक्षा, दुष्प्रचार पर नजर और जवानों को अनजाने में होने वाली चूक से बचाना।

देखने की अनुमति, प्रतिक्रिया पर रोक

नई व्यवस्था के तहत सैनिक सोशल मीडिया पर मौजूद सामग्री को देख सकेंगे, उससे अवगत रह सकेंगे और यह समझ सकेंगे कि डिजिटल दुनिया में किस तरह का कंटेंट फैल रहा है। यदि उन्हें कोई फर्जी, भ्रामक या संदिग्ध पोस्ट दिखाई देती है, तो वे उसकी जानकारी अपने वरिष्ठ अधिकारियों तक पहुंचा सकेंगे। इस तरह सेना सोशल मीडिया को केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि सूचना युद्ध के एक मोर्चे के रूप में देख रही है।

यह व्यवस्था सैनिकों को सक्रिय भागीदारी से दूर रखती है, ताकि वे भावनात्मक या जल्दबाजी में किसी बहस, विवाद या ट्रेंड का हिस्सा न बनें। सेना का मानना है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म पर एक छोटी सी प्रतिक्रिया भी सुरक्षा के लिहाज से बड़ा जोखिम बन सकती है।

नई नीति सैनिकों को पूरी तरह डिजिटल दुनिया से काटती नहीं है, बल्कि उन्हें जागरूक दर्शक की भूमिका में रखती है। वे देखेंगे, समझेंगे और जरूरत पड़ने पर रिपोर्ट करेंगे। इससे सेना के भीतर आंतरिक सतर्कता और मजबूत होगी।

हनी ट्रैप और सूचना लीक की पृष्ठभूमि

सोशल मीडिया पर सख्ती के पीछे सबसे बड़ा कारण बीते वर्षों में सामने आए हनी ट्रैप और सूचना लीक के मामले रहे हैं। कई बार विदेशी एजेंसियों ने नकली प्रोफाइल और भावनात्मक जाल के जरिए सैनिकों से संपर्क साधा और उनसे अनजाने में संवेदनशील जानकारियां हासिल कीं। इन घटनाओं ने यह साफ कर दिया कि सोशल मीडिया पर थोड़ी सी लापरवाही भी राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरे में डाल सकती है।

अनजाने में हुई बड़ी चूक

कई मामलों में सैनिकों को यह एहसास भी नहीं हुआ कि वे किससे बात कर रहे हैं और क्या साझा कर रहे हैं। तस्वीरें, लोकेशन और व्यक्तिगत जानकारी धीरे-धीरे बड़ी सुरक्षा चूक में बदल गईं।

इन्हीं अनुभवों के आधार पर सेना ने यह तय किया कि सोशल मीडिया पर नियंत्रण केवल विकल्प नहीं, बल्कि आवश्यकता है। नई नीति उसी सोच का विस्तार है।

सेना प्रमुख का नजरिया

हाल ही में सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने चाणक्य डिफेंस डायलॉग के दौरान सोशल मीडिया और सेना के संबंधों पर खुलकर बात की थी। उन्होंने स्वीकार किया कि जेनरेशन-Z के युवाओं के लिए स्मार्टफोन और सोशल मीडिया जीवन का अहम हिस्सा हैं, लेकिन सेना में अनुशासन और संयम सबसे पहले आता है।

जनरल द्विवेदी ने कहा कि जब युवा कैडेट एनडीए में आते हैं, तो उन्हें यह समझने में समय लगता है कि फोन के बिना भी जीवन संभव है। यह प्रक्रिया आसान नहीं होती, लेकिन जरूरी होती है।

स्मार्टफोन से पूरी मनाही नहीं

उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि सेना स्मार्टफोन के उपयोग के खिलाफ नहीं है। फील्ड में तैनात जवानों के लिए परिवार से संपर्क, बच्चों की पढ़ाई और माता-पिता की सेहत की जानकारी फोन के जरिए ही संभव होती है। इसलिए संतुलन बनाए रखना जरूरी है।

रिएक्ट नहीं, रिस्पॉन्ड की सोच

सेना प्रमुख ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देने और सोच-समझकर जवाब देने के फर्क को भी रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि सेना नहीं चाहती कि उसके जवान जल्दबाजी में किसी डिजिटल बहस में उलझें। यही कारण है कि एक्स जैसे प्लेटफॉर्म पर भी केवल देखने की अनुमति दी गई है, प्रतिक्रिया की नहीं।

सेना का मानना है कि अनुशासन केवल मैदान में नहीं, बल्कि डिजिटल व्यवहार में भी उतना ही जरूरी है। एक सैनिक की पहचान उसकी वर्दी से कहीं आगे जाती है।

पहले भी बदले हैं नियम

यह पहली बार नहीं है जब सेना ने सोशल मीडिया को लेकर सख्ती दिखाई हो। 2017 में संसद में बताया गया था कि दिशा-निर्देश सूचना सुरक्षा के लिए बनाए गए हैं। 2019 तक सैनिक किसी भी सोशल मीडिया ग्रुप का हिस्सा नहीं बन सकते थे। 2020 में 89 मोबाइल ऐप्स हटाने के निर्देश दिए गए थे।

इसके बावजूद कुछ प्लेटफॉर्म्स जैसे फेसबुक, यूट्यूब, एक्स, लिंक्डइन और व्हाट्सऐप को सीमित उपयोग की अनुमति दी गई, वह भी सख्त निगरानी तंत्र के तहत।

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Dipali Kumari

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दीपाली कुमारी सक्रिय पत्रकार और हिंदी कंटेंट राइटर हैं, जिन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में तीन वर्षों का अनुभव है। उन्होंने रांची के गोस्सनर कॉलेज से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की है। सामाजिक सरोकारों, जन-जागरूकता और जमीनी मुद्दों पर तथ्यपरक एवं संवेदनशील लेखन उनकी प्रमुख पहचान है। आम लोगों की आवाज़ को मुख्यधारा तक पहुँचाना और समाज से जुड़े महत्वपूर्ण विषयों को प्रभावशाली तरीके से प्रस्तुत करना उनकी पत्रकारिता का मुख्य उद्देश्य है। अनुभव : पिछले तीन वर्षों से वे सक्रिय पत्रकारिता और डिजिटल कंटेंट लेखन से जुड़ी हुई हैं। इस दौरान उन्होंने सामाजिक मुद्दों, जनहित विषयों और स्थानीय समस्याओं पर लगातार लेखन किया है। उनकी रिपोर्टिंग और लेखन शैली जमीनी समझ, स्पष्ट प्रस्तुति और पाठक-केंद्रित दृष्टिकोण को दर्शाती है। वर्तमान फोकस : वे समाज, शिक्षा, महिला सशक्तिकरण, जन-जागरूकता और सामाजिक बदलाव से जुड़े विषयों पर लेखन करती हैं। उनकी प्राथमिकता ऐसी खबरें और लेख तैयार करना है, जो आम लोगों से सीधे जुड़ाव बनाएं और सकारात्मक सामाजिक प्रभाव उत्पन्न करें। मुख्य विशेषज्ञता (Core Expertise) : • सामाजिक मुद्दों पर लेखन : जनहित, सामाजिक बदलाव और आम लोगों से जुड़े विषयों पर संवेदनशील और प्रभावशाली रिपोर्टिंग। • जमीनी रिपोर्टिंग : स्थानीय समस्याओं और वास्तविक परिस्थितियों को सरल एवं स्पष्ट भाषा में प्रस्तुत करना। • जन-जागरूकता आधारित कंटेंट : शिक्षा, महिला सशक्तिकरण और सामाजिक जागरूकता से जुड़े विषयों पर जानकारीपूर्ण लेखन। • हिंदी कंटेंट निर्माण : पाठकों के लिए सहज, विश्वसनीय और प्रभावी हिंदी कंटेंट तैयार करने में विशेषज्ञता। विश्वसनीयता का आधार (Credibility Signal) : जमीनी मुद्दों की गहरी समझ, निष्पक्ष दृष्टिकोण और समाज-केंद्रित लेखन शैली ने दीपाली कुमारी को एक संवेदनशील और भरोसेमंद हिंदी पत्रकार के रूप में स्थापित किया है। जनहित से जुड़े विषयों पर उनकी निरंतर सक्रियता और तथ्यपरक लेखन उनकी विश्वसनीयता को मजबूत बनाते हैं।