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बिहार कैबिनेट का बड़ा फैसला: पटना चिड़ियाघर और डेयरी संस्थान से हटेगा संजय गांधी का नाम, जानिए नया नाम

बिहार कैबिनेट का बड़ा फैसला: पटना चिड़ियाघर और डेयरी संस्थान से हटेगा संजय गांधी का नाम, जानिए नया नाम
बिहार कैबिनेट का बड़ा फैसला: पटना चिड़ियाघर और डेयरी संस्थान से हटेगा संजय गांधी का नाम, जानिए नया नाम (File Photo)

बिहार कैबिनेट ने पटना के संजय गांधी जैविक उद्यान और संजय गांधी इंस्टीट्यूट ऑफ डेयरी टेक्नोलॉजी से संजय गांधी का नाम हटाने का फैसला लिया है। अब ये संस्थान क्रमशः पटना जू और बिहार स्टेट इंस्टीट्यूट ऑफ डेयरी टेक्नोलॉजी के नाम से जाने जाएंगे।

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Dipali Kumari
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Patna Zoo: बिहार कैबिनेट की बैठक में कल बुधवार को लिया गया एक बड़ा निर्णय अब चर्चा का विषय बन गया है। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी की अध्यक्षता में हुई बिहार कैबिनेट बैठक में राज्य के दो प्रमुख संस्थानों से दिवंगत कांग्रेस नेता संजय गांधी का नाम हटाने का फैसला किया गया। इस निर्णय के बाद राजधानी पटना के प्रसिद्ध संजय गांधी जैविक उद्यान की आधिकारिक पहचान बदल जाएगी साथ ही डेयरी शिक्षा के अहम संस्थान का नाम भी नया रूप लेगा।

अब “पटना जू” के नाम से जाना जाएगा चिड़ियाघर

कैबिनेट के फैसले के अनुसार अब “संजय गांधी जैविक उद्यान” को आधिकारिक रूप से “पटना जू” के नाम से जाना जाएगा। हालांकि आम लोगों की जुबान पर यह जगह पहले से ही पटना चिड़ियाखाना या पटना जू के नाम से मशहूर रही है, लेकिन सरकारी दस्तावेजों और प्रशासनिक संरचना में संजय गांधी का नाम जुड़ा हुआ था। अब वन एवं पर्यावरण विभाग के अंतर्गत संचालित समिति का नाम भी बदलकर “पटना जू प्रबंधन एवं विकास सोसाइटी” कर दिया गया है।

“संजय गांधी इंस्टीट्यूट ऑफ डेयरी टेक्नोलॉजी” का भी नाम बदला

इसी तरह डेयरी, मत्स्य और पशु संसाधन विभाग के तहत संचालित “संजय गांधी इंस्टीट्यूट ऑफ डेयरी टेक्नोलॉजी” का नाम बदलकर “बिहार स्टेट इंस्टीट्यूट ऑफ डेयरी टेक्नोलॉजी, पटना” कर दिया गया है। यह संस्थान बिहार पशु विज्ञान विश्वविद्यालय के अंतर्गत संचालित होता है और यहां डेयरी टेक्नोलॉजी, डेयरी इंजीनियरिंग, डेयरी केमिस्ट्री, डेयरी माइक्रोबायोलॉजी और डेयरी बिजनेस मैनेजमेंट जैसे पेशेवर कोर्स कराए जाते हैं। इस फैसले का असर हजारों छात्रों और संस्थान की नई प्रशासनिक पहचान पर पड़ेगा।

देश के प्रमुख चिड़ियाघरों में शामिल है पटना जू

पटना जू की बात करें तो इसकी शुरुआत 1969 में हुई थी, जब तत्कालीन राज्यपाल नित्यानंद कानूनगो ने राजभवन की 34 एकड़ जमीन वनस्पति उद्यान के लिए दी थी। बाद में 1972 में इसमें और जमीन जोड़कर इसे जैविक उद्यान का स्वरूप दिया गया और 1973 में इसे आम लोगों के लिए खोल दिया गया। आज यह बिहार ही नहीं, देश के प्रमुख चिड़ियाघरों में गिना जाता है, जहां 110 प्रजातियों के करीब 800 जीव-जंतु और सैकड़ों दुर्लभ पेड़-पौधे मौजूद हैं।

वहीं डेयरी संस्थान की स्थापना 1980 में कांग्रेस शासनकाल के दौरान हुई थी और यह बिहार में डेयरी शिक्षा का प्रमुख केंद्र माना जाता है।

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Dipali Kumari

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दीपाली कुमारी सक्रिय पत्रकार और हिंदी कंटेंट राइटर हैं, जिन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में तीन वर्षों का अनुभव है। उन्होंने रांची के गोस्सनर कॉलेज से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की है। सामाजिक सरोकारों, जन-जागरूकता और जमीनी मुद्दों पर तथ्यपरक एवं संवेदनशील लेखन उनकी प्रमुख पहचान है। आम लोगों की आवाज़ को मुख्यधारा तक पहुँचाना और समाज से जुड़े महत्वपूर्ण विषयों को प्रभावशाली तरीके से प्रस्तुत करना उनकी पत्रकारिता का मुख्य उद्देश्य है। अनुभव : पिछले तीन वर्षों से वे सक्रिय पत्रकारिता और डिजिटल कंटेंट लेखन से जुड़ी हुई हैं। इस दौरान उन्होंने सामाजिक मुद्दों, जनहित विषयों और स्थानीय समस्याओं पर लगातार लेखन किया है। उनकी रिपोर्टिंग और लेखन शैली जमीनी समझ, स्पष्ट प्रस्तुति और पाठक-केंद्रित दृष्टिकोण को दर्शाती है। वर्तमान फोकस : वे समाज, शिक्षा, महिला सशक्तिकरण, जन-जागरूकता और सामाजिक बदलाव से जुड़े विषयों पर लेखन करती हैं। उनकी प्राथमिकता ऐसी खबरें और लेख तैयार करना है, जो आम लोगों से सीधे जुड़ाव बनाएं और सकारात्मक सामाजिक प्रभाव उत्पन्न करें। मुख्य विशेषज्ञता (Core Expertise) : • सामाजिक मुद्दों पर लेखन : जनहित, सामाजिक बदलाव और आम लोगों से जुड़े विषयों पर संवेदनशील और प्रभावशाली रिपोर्टिंग। • जमीनी रिपोर्टिंग : स्थानीय समस्याओं और वास्तविक परिस्थितियों को सरल एवं स्पष्ट भाषा में प्रस्तुत करना। • जन-जागरूकता आधारित कंटेंट : शिक्षा, महिला सशक्तिकरण और सामाजिक जागरूकता से जुड़े विषयों पर जानकारीपूर्ण लेखन। • हिंदी कंटेंट निर्माण : पाठकों के लिए सहज, विश्वसनीय और प्रभावी हिंदी कंटेंट तैयार करने में विशेषज्ञता। विश्वसनीयता का आधार (Credibility Signal) : जमीनी मुद्दों की गहरी समझ, निष्पक्ष दृष्टिकोण और समाज-केंद्रित लेखन शैली ने दीपाली कुमारी को एक संवेदनशील और भरोसेमंद हिंदी पत्रकार के रूप में स्थापित किया है। जनहित से जुड़े विषयों पर उनकी निरंतर सक्रियता और तथ्यपरक लेखन उनकी विश्वसनीयता को मजबूत बनाते हैं।