Maharashtra Tribal Students Hunger Strike: पढ़ने आए आदिवासी छात्रों को मिले नियमों के ‘डंडे’?

Tribal Hostel Rules : महाराष्ट्र के आदिवासी छात्र छात्रावास के नियमों और सुविधाओं को लेकर आंदोलन पर हैं। राहुल गांधी ने फडणवीस से छात्रों से मिलकर उनकी समस्याओं के समाधान की मांग की।
विषयसूची
10 दिन से ज्यादा की भूख हड़ताल के बाद राहुल गांधी ने फडणवीस से पूछा बड़ा सवाल
Maharashtra Tribal Students Hunger Strike: महाराष्ट्र के सरकारी आदिवासी छात्रावासों की व्यवस्था को लेकर छात्रों का विरोध अब राजनीतिक मुद्दा बन गया है। लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस को पत्र लिखकर आंदोलन कर रहे आदिवासी छात्रों की शिकायतों पर तत्काल कार्रवाई की मांग की। उन्होंने मुख्यमंत्री से प्रदर्शनकारी छात्रों के प्रतिनिधियों से व्यक्तिगत रूप से मिलने और उनकी समस्याओं का समाधान करने का आग्रह किया। गांधी ने अपने पत्र के साथ छात्रों का ज्ञापन भी संलग्न किया है। पुणे के मांजरी स्थित सरकारी आदिवासी छात्रावास में छात्र 11 दिनों से आंदोलन कर रहे थे। 24 अगस्त को छात्रों ने पुणे में विरोध मार्च भी निकाला। उनकी आपत्तियां छात्रावास में रहने की उम्र सीमा के साथ-साथ वहां लागू नियमों, सुविधाओं और छात्रों की सुरक्षा से जुड़े मुद्दों को लेकर हैं।
5 अगस्त के आदेश से शुरू हुआ विवाद
विवाद की शुरुआत महाराष्ट्र के आदिवासी विकास विभाग के 5 अगस्त के शासन निर्णय से हुई। इस आदेश में छात्रावास में रहने वाले विद्यार्थियों के लिए कई शर्तें रखी गई थीं। इनमें छात्रों को छात्रावास संबंधी शिकायत पहले वार्डन या संबंधित अधिकारी को लिखित रूप में देने और संगठनों, भूख हड़ताल या विरोध प्रदर्शन में भाग लेने पर रोक जैसे प्रावधान शामिल थे। मीडिया के माध्यम से शिकायत उठाने और प्रशासन के खिलाफ छात्रों को संगठित करने पर भी प्रतिबंध का प्रावधान था। इन प्रावधानों के खिलाफ राज्य के कई हिस्सों में छात्रों ने विरोध किया। इसके बाद सरकार ने 14 अगस्त को संशोधित शासन निर्णय जारी किया। इसमें पहले लगाए गए विरोध-प्रदर्शन संबंधी प्रतिबंध हटा दिए गए और छात्रावास में प्रवेश की अधिकतम आयु 26 से बढ़ाकर 30 वर्ष कर दी गई। यानी मौजूदा स्थिति को समझने के लिए यह फर्क महत्वपूर्ण है कि 30 वर्ष की उम्र सीमा मूल 5 अगस्त के आदेश में नहीं, बल्कि 14 अगस्त के संशोधित आदेश में तय हुई थी। इसके बावजूद छात्रों का आंदोलन जारी रहा।
उम्र सीमा पर छात्रों की सबसे बड़ी आपत्ति
छात्रों का कहना है कि आदिवासी समुदाय से आने वाले कई विद्यार्थियों की पढ़ाई सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों के कारण देर से शुरू होती है या बीच में रुक जाती है। ऐसे विद्यार्थियों के लिए शहरों में सरकारी छात्रावास उच्च शिक्षा जारी रखने का महत्वपूर्ण साधन हैं। इसी वजह से आंदोलनकारी उम्र की सीमा में और राहत की मांग कर रहे हैं। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार छात्रों ने उम्र सीमा को पूरी तरह हटाने या इसे 36 वर्ष तक करने की मांग रखी है। उनका तर्क है कि छात्रावास की सुविधा केवल उम्र के आधार पर खत्म करने के बजाय विद्यार्थी की वास्तविक शैक्षणिक स्थिति को भी देखा जाना चाहिए। यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि सरकार ने 30 वर्ष की सीमा बढ़ाकर छात्रों की एक मांग पर राहत दी है, लेकिन आंदोलनकारी इस बदलाव से पूरी तरह संतुष्ट नहीं हुए हैं।
छात्राओं के ‘प्रेग्नेंसी टेस्ट’ का आरोप
पूरे विवाद में सबसे गंभीर और संवेदनशील आरोप छात्राओं से जुड़ा है। राहुल गांधी ने फडणवीस को लिखे पत्र में दावा किया कि लंबे समय तक छात्रावास से बाहर रहने के बाद लौटने वाली छात्राओं को कथित तौर पर प्रेग्नेंसी टेस्ट और अन्य मेडिकल जांच से गुजरना पड़ता है। उन्होंने इसे छात्राओं की गरिमा के खिलाफ बताया। राहुल गांधी के पत्र में इसे एक कथित नियम के तौर पर उठाया गया है, जबकि छात्रों ने भी इसकी शिकायत की है। लेकिन उपलब्ध ताजा रिपोर्टों में इस बात की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है कि महाराष्ट्र के सभी सरकारी आदिवासी छात्रावासों में ऐसा अनिवार्य नियम लागू है। इसलिए इस मामले में ‘प्रेग्नेंसी टेस्ट का नियम लागू है’ कहना तथ्यात्मक रूप से ज्यादा मजबूत दावा होगा, सही शब्दावली ‘छात्रों का आरोप’, ‘कथित प्रावधान’ या ‘राहुल गांधी द्वारा उठाई गई शिकायत’ है। हालांकि, छात्रावासों में छात्राओं की मेडिकल जांच को लेकर विवाद पहले भी सामने आ चुका है। अक्टूबर 2025 में पुणे के वाकड स्थित आदिवासी छात्रावास में छात्राओं के कथित प्रेग्नेंसी टेस्ट का मामला सामने आया था और जांच की बात कही गई थी। इस पुराने मामले के कारण मौजूदा आरोप को लेकर भी सवाल गंभीर हो जाते हैं, लेकिन दोनों घटनाओं को एक ही मामला मानना उचित नहीं होगा।
भोजन, स्वच्छता और सुरक्षा भी सवालों के घेरे में
राहुल गांधी ने अपने पत्र में छात्रावासों में भोजन, स्वच्छता और चिकित्सा सुविधाओं की कमी का भी उल्लेख किया। उन्होंने छात्रों द्वारा चोट लगने और सांप के काटने जैसी घटनाओं का जिक्र किया तथा छात्राओं के लिए स्थितियां और खराब होने का दावा किया। छात्र सुरक्षा का मुद्दा हाल की एक अलग घटना के कारण भी चर्चा में है। गढ़चिरौली जिले के एक आदिवासी आवासीय विद्यालय में सांप के काटने से तीन छात्राओं की मौत हो गई थी, जबकि कई अन्य छात्राएं प्रभावित हुई थीं। घटना के बाद महाराष्ट्र के आदिवासी विकास विभाग ने संबंधित आश्रमशाला की सरकारी संबद्धता रद्द कर दी और वहां बचे विद्यार्थियों को दूसरी आश्रमशालाओं में भेजने का फैसला किया। यह घटना मांजरी छात्रावास के आंदोलन से अलग है, इसलिए दोनों को सीधे जोड़ना सही नहीं होगा। लेकिन इससे आदिवासी विद्यार्थियों के आवासीय संस्थानों में सुरक्षा और बुनियादी सुविधाओं की निगरानी का सवाल जरूर सामने आता है।
11 दिन की भूख हड़ताल, कुछ छात्र अस्पताल भी पहुंचे
मांजरी में जारी आंदोलन का असर छात्रों की सेहत पर भी पड़ा है। स्थानीय रिपोर्ट के अनुसार छात्र 11वें दिन तक अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर थे और कुछ आंदोलनकारियों को इलाज के लिए अस्पताल ले जाना पड़ा। एक रिपोर्ट में चार छात्रों के अस्पताल पहुंचने की जानकारी दी गई है। ऐसे में आंदोलन का सबसे अहम पहलू यह है कि छात्र केवल ज्ञापन देकर या प्रदर्शन करके नहीं रुके हैं, बल्कि उनकी मांगों को लेकर भूख हड़ताल तक पहुंच चुके हैं। यही स्थिति राहुल गांधी के पत्र का भी मुख्य आधार बनी है।
राहुल गांधी ने फडणवीस से क्या मांग की?
राहुल गांधी ने मुख्यमंत्री से आंदोलनकारी छात्रों के प्रतिनिधियों से सीधे मुलाकात करने और उनकी शिकायतों पर तत्काल निर्णय लेने को कहा है। उन्होंने कहा कि दूरदराज के गांवों और कस्बों से आने वाले आदिवासी विद्यार्थी शहरों में पढ़ाई के लिए सरकारी छात्रावासों पर निर्भर हैं। अपने पत्र में गांधी ने छात्रावासों की कथित असुरक्षित परिस्थितियों, भोजन, स्वच्छता और चिकित्सा सुविधाओं की कमी का मुद्दा उठाया। उन्होंने छात्राओं से जुड़ी कथित मेडिकल जांच को भी गंभीर चिंता का विषय बताया। यह पत्र उनके पुणे दौरे के बाद आया है। ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम में एक छात्रा ने आदिवासी विद्यार्थियों की समस्याएं उनके सामने रखी थीं। इसके बाद गांधी ने इन्हीं मुद्दों को मुख्यमंत्री के समक्ष उठाया।
सरकार ने कदम उठाए, फिर भी छात्रों का आंदोलन क्यों जारी?
Maharashtra Tribal Students Hunger Strike: सरकार ने छात्रों के विरोध के बाद 14 अगस्त को पुराने विवादित प्रतिबंध हटाए और अधिकतम आयु 26 से बढ़ाकर 30 वर्ष की। लेकिन आंदोलन खत्म नहीं हुआ। इससे संकेत मिलता है कि छात्रों की शिकायतें केवल एक उम्र सीमा या एक शासन निर्णय तक सीमित नहीं हैं। उनकी मांगों में छात्रावास की सुविधाओं, सुरक्षा और नियमों की समीक्षा जैसे व्यापक मुद्दे शामिल हैं। इसलिए अब सरकार के सामने चुनौती केवल आदेश में संशोधन करने की नहीं, बल्कि आंदोलनकारी छात्रों के साथ सीधा संवाद स्थापित करने की भी है। फिलहाल उपलब्ध तथ्यों से तीन बातें साफ हैं-आदिवासी छात्र महाराष्ट्र में सरकारी छात्रावासों से जुड़े नियमों के खिलाफ आंदोलन कर रहे हैं, 5 अगस्त के विवादित आदेश के बाद सरकार ने 14 अगस्त को कुछ अहम बदलाव किए हैं, और इसके बावजूद पुणे में छात्रों की भूख हड़ताल जारी रही। वहीं छात्राओं के कथित प्रेग्नेंसी टेस्ट का मामला गंभीर है, लेकिन इसकी व्यापक पुष्टि के बिना इसे पूरे राज्य के छात्रावासों पर लागू नियम बताना सही नहीं होगा।
अब निगाह महाराष्ट्र सरकार के अगले कदम पर है। क्या मुख्यमंत्री आंदोलनकारी छात्रों से सीधे बातचीत करेंगे? क्या उम्र सीमा और छात्रावास की बाकी व्यवस्थाओं पर फिर समीक्षा होगी? और सबसे अहम-क्या छात्रों की उन शिकायतों की स्वतंत्र जांच होगी, जिनमें उनकी सुरक्षा और गरिमा से जुड़े आरोप लगाए गए हैं? मामला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इन छात्रावासों का मूल उद्देश्य ही उन आदिवासी विद्यार्थियों को शिक्षा जारी रखने में मदद देना है, जो अपने गांवों और दूरदराज के इलाकों से शहरों में आते हैं। ऐसे में व्यवस्था का सवाल केवल नियमों का नहीं, बल्कि शिक्षा तक पहुंच, सुरक्षा और सम्मान का भी है।

