नागपुर विश्वविद्यालय में एकात्म मानव दर्शन पर राष्ट्रीय संगोष्ठी, डॉ. अमोल पुसदकर ने कहा- आचरण में उतारने की जरूरत

नागपुर विश्वविद्यालय में एकात्म मानव दर्शन पर राष्ट्रीय संगोष्ठी: नागपुर विश्वविद्यालय में 26 और 27 सितंबर को ‘एकात्म मानव दर्शन और भारतीय लोक’ विषय पर राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित हुई। डॉ. अमोल पुसदकर ने कहा कि एकात्म मानव दर्शन केवल चर्चा नहीं, बल्कि आचरण का विषय है। उन्होंने व्यक्ति, समाज, प्रकृति और परमात्मा के आपसी संबंध पर जोर दिया। कार्यक्रम में विभिन्न वक्ताओं, विद्यार्थियों और शोधार्थियों ने भाग लिया।
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एकात्म मानव दर्शन को जीवन में उतारने पर जोर
नागपुर विश्वविद्यालय में एकात्म मानव दर्शन पर राष्ट्रीय संगोष्ठी: नागपुर। एकात्म मानव दर्शन केवल चर्चा का विषय नहीं, बल्कि आचरण का विषय है। यह विचार वरिष्ठ वक्ता एवं चिंतक डॉ. अमोल पुसदकर ने व्यक्त किए। वे राष्ट्रसंत तुकड़ोजी महाराज नागपुर विश्वविद्यालय में आयोजित ‘एकात्म मानव दर्शन और भारतीय लोक’ विषयक दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी को संबोधित कर रहे थे।
संगोष्ठी 26 और 27 सितंबर को विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग, दर्शनशास्त्र विभाग, भारतीय दार्शनिक अनुसंधान परिषद (नई दिल्ली) तथा प्रज्ञा प्रवाह, विदर्भ विभाग के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित की गई। कुलगुरु डॉ. मनाली क्षीरसागर के मार्गदर्शन में हुए इस आयोजन की अध्यक्षता विश्वविद्यालय के वित्त एवं लेखा अधिकारी हरीश पालीवाल ने की। मंच पर प्रमुख वक्ता डॉ. अमोल पुसदकर, गोवा विश्वविद्यालय के डॉ. भूषण भावे, वरिष्ठ साहित्यकार गिरीश पंकज तथा संयोजक डॉ. मनोज पांडेय उपस्थित थे।
बीज सत्र में डॉ. पुसदकर ने कहा कि आज विश्व के अनेक देश युद्ध की स्थिति से गुजर रहे हैं। स्वार्थ, एकांगी विचारधारा और आपसी द्वेष के कारण संघर्ष बढ़ रहे हैं। ऐसी परिस्थितियों में पंडित दीनदयाल उपाध्याय द्वारा प्रतिपादित एकात्म मानव दर्शन की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि व्यक्ति, समाज, प्रकृति और परमात्मा एक-दूसरे से अलग नहीं, बल्कि परस्पर जुड़े हुए हैं। यही समग्र दृष्टिकोण वैश्विक समन्वय का आधार बन सकता है।
संगोष्ठी में भारतीय संस्कृति और सामाजिक मूल्यों पर चर्चा
उन्होंने कहा कि मनुष्य आज धन और अनियंत्रित विलासिता के पीछे भाग रहा है तथा अपनी संस्कृति और जीवन-मूल्यों से दूर होता जा रहा है। उन्होंने कहा, “मनुष्य की उपजीविका जीवन से बड़ी नहीं होनी चाहिए।”
उद्घाटन सत्र में स्मारिका, ‘विद्यार्थी-दृष्टि’ तथा डॉ. मनोज पांडेय द्वारा संपादित ‘पंडित दीनदयाल उपाध्याय एवं एकात्म मानव दर्शन’ ग्रंथ का विमोचन किया गया। हरीश पालीवाल ने पंडित दीनदयाल उपाध्याय को महान विचारक बताते हुए उनके विचारों को व्यापक सामाजिक दृष्टि का आधार बताया।
गोवा विश्वविद्यालय के डॉ. भूषण भावे ने परंपराओं को युगानुकूल बनाने और बाहरी विचारों को देशानुकूल बनाने की आवश्यकता बताई। वरिष्ठ साहित्यकार गिरीश पंकज ने भारतीय संस्कृति में प्रकृति के प्रति सम्मान को एकात्म मानव दर्शन का प्रतिबिंब बताया।
कार्यक्रम का संचालन डॉ. लखेश्वर चंद्रवंशी ने किया तथा आभार डॉ. धीरज कदम ने माना। संगोष्ठी में विभिन्न विश्वविद्यालयों एवं महाविद्यालयों के शोधार्थी और विद्यार्थी बड़ी संख्या में उपस्थित रहे।
रिपोर्ट: जस्सी, महाराष्ट्र

