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नागपुर विश्वविद्यालय ने पारा वाले खराब विद्युत लैंपों की सुरक्षित निकासी के लिए नई वैज्ञानिक तकनीक विकसित की

नागपुर विश्वविद्यालय ने पारा वाले खराब विद्युत लैंपों की सुरक्षित निकासी के लिए नई वैज्ञानिक तकनीक विकसित की
Nagpur University Mercury Lamp Safe Disposal: नागपुर विश्वविद्यालय ने पारा वाले खराब विद्युत लैंपों की सुरक्षित निकासी के लिए नई वैज्ञानिक तकनीक विकसित की (Photo: RB / Jassi)

Nagpur University Mercury Lamp Safe Disposal: राष्ट्रसंत तुकडोजी महाराज नागपुर विश्वविद्यालय ने पारा युक्त फ्लोरोसेंट ट्यूब और सीएफएल लैंपों की सुरक्षित निकासी के लिए नई वैज्ञानिक तकनीक विकसित की है। शोध दल ने विशेष कलेक्शन यूनिट और सुरक्षित रासायनिक प्रक्रिया तैयार की है। इस तकनीक से पारा को वातावरण में फैलने से रोका जा सकेगा और उसका दोबारा औद्योगिक उपयोग भी संभव होगा।

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Asfi Shadab
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पारा वाले खराब लैंपों के सुरक्षित निस्तारण की नई व्यवस्था

Nagpur University Mercury Lamp Safe Disposal: नागपुर, 6 जुलाई 2026: राष्ट्रसंत तुकडोजी महाराज नागपुर विश्वविद्यालय ने देश में पहली बार फ्लोरोसेंट ट्यूब और सीएफएल जैसे पारा (मरकरी) युक्त खराब विद्युत लैंपों के सुरक्षित निस्तारण की वैज्ञानिक प्रक्रिया विकसित की है।

विश्वविद्यालय के भौतिकी विभागाध्यक्ष एवं वरिष्ठ प्राध्यापक डॉ. संजय जानराव ढोबळे तथा उनके शोधार्थी संकेत हेलोडे और अभिजीत कदम ने इस तकनीक का विकास किया है, जिसके लिए उन्हें दो पेटेंट प्राप्त हुए हैं।

फ्लोरोसेंट ट्यूब और सीएफएल में मरकरी की मात्रा होती है। इनके टूटने पर जहरीली मरकरी गैस वातावरण, मिट्टी और जल में मिलकर गंभीर प्रदूषण फैलाती है और मानव स्वास्थ्य के लिए खतरा बनती है। एलईडी लैंप मरकरी-मुक्त होने के कारण सुरक्षित माने जाते हैं। विदेशों में मरकरी युक्त लैंपों पर वर्षों पहले प्रतिबंध लगाया जा चुका है, लेकिन भारत में अब तक इनके सुरक्षित निस्तारण की कोई प्रभावी व्यवस्था नहीं थी।

विशेष कलेक्शन यूनिट से घर-घर होगा खराब लैंपों का सुरक्षित संग्रहण

इस समस्या के समाधान के लिए शोध दल ने एक विशेष लैंप कलेक्शन यूनिट तैयार की है, जिसे कचरा संग्रहण वाहनों पर लगाया जा सकता है। इस यूनिट के जरिए घर-घर से खराब ट्यूब और सीएफएल बिना टूटे एकत्र किए जाएंगे। इसके बाद विशेष बंद व्यवस्था और रासायनिक प्रक्रिया से मरकरी को सुरक्षित रूप से अलग किया जाएगा, ताकि वह वातावरण में न फैले। एकत्रित मरकरी का पुनः औद्योगिक उपयोग भी संभव होगा।

विश्वविद्यालय की कुलगुरु डॉ. मनाली क्षीरसागर, प्र-कुलगुरु डॉ. अखिलेश पेशवे, प्रभारी कुलसचिव डॉ. विजय खंडाळ तथा अनुसंधान एवं विस्तार विभाग के संचालक डॉ. दादासाहेब कोकरे ने डॉ. ढोबळे और उनके शोधार्थियों को इस शोध के लिए बधाई दी। यह शोध स्वच्छ, प्रदूषण-मुक्त और पर्यावरण-अनुकूल शहरों के निर्माण की दिशा में महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है।


रिपोर्ट: जस्सी, महाराष्ट्र

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