
पश्चिम बंगाल के बांकुड़ा जिले के सिमलापाल इलाके में चुनावी माहौल गरमाने लगा है। एक तरफ जहां सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस अपनी विकास योजनाओं का ढोल पीट रही है, वहीं दूसरी तरफ भाजपा भ्रष्टाचार के मुद्दे पर सरकार को घेरने में जुटी है। पिछले कुछ दिनों से सिमलापाल में इन दोनों पार्टियों के बीच सीधी जंग देखने को मिल रही है। तालडांगरा विधानसभा क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले सिमलापाल में तृणमूल कांग्रेस ने अपने शीर्ष नेतृत्व के निर्देश पर ‘विकास की पाचाली’ कार्यक्रम शुरू किया है। इस कार्यक्रम में स्थानीय विधायक फाल्गुनी सिंह बाबू सहित तृणमूल के कई बड़े नेता शामिल

पश्चिम बंगाल के बांकुड़ा जिले के सिमलापाल इलाके में चुनावी माहौल गरमाने लगा है। एक तरफ जहां सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस अपनी विकास योजनाओं का ढोल पीट रही है, वहीं दूसरी तरफ भाजपा भ्रष्टाचार के मुद्दे पर सरकार को घेरने में जुटी है। पिछले कुछ दिनों से सिमलापाल में इन दोनों पार्टियों के बीच सीधी जंग देखने को मिल रही है। तालडांगरा विधानसभा क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले सिमलापाल में तृणमूल कांग्रेस ने अपने शीर्ष नेतृत्व के निर्देश पर ‘विकास की पाचाली’ कार्यक्रम शुरू किया है। इस कार्यक्रम में स्थानीय विधायक फाल्गुनी सिंह बाबू सहित तृणमूल के कई बड़े नेता शामिल

बांकुड़ा के जयरामबाटी में आज मां शारदा की 173वीं जयंती बड़े धूमधाम से मनाई जा रही है। मातृ मंदिर में सुबह से ही पूजा-पाठ, भक्ति संगीत और विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया गया है। इस पवित्र दिन पर मां शारदा की जन्मस्थली में देश-विदेश से हजारों भक्त और श्रद्धालु पहुंचे हैं। 22 दिसंबर 1853 को बांकुड़ा के जयरामबाटी में मां शारदा का जन्म हुआ था। कम उम्र में ही कामारपुकुर के रामकृष्ण देव से उनका विवाह हो गया था, लेकिन उनके जीवन का एक बड़ा हिस्सा जयरामबाटी में ही बीता। जयरामबाटी में मातृ मंदिर की स्थापना के बाद से

बांकुड़ा के जयरामबाटी में आज मां शारदा की 173वीं जयंती बड़े धूमधाम से मनाई जा रही है। मातृ मंदिर में सुबह से ही पूजा-पाठ, भक्ति संगीत और विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया गया है। इस पवित्र दिन पर मां शारदा की जन्मस्थली में देश-विदेश से हजारों भक्त और श्रद्धालु पहुंचे हैं। 22 दिसंबर 1853 को बांकुड़ा के जयरामबाटी में मां शारदा का जन्म हुआ था। कम उम्र में ही कामारपुकुर के रामकृष्ण देव से उनका विवाह हो गया था, लेकिन उनके जीवन का एक बड़ा हिस्सा जयरामबाटी में ही बीता। जयरामबाटी में मातृ मंदिर की स्थापना के बाद से