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बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में नोटा का बढ़ता प्रभाव, मतदाताओं की मौन अभिव्यक्ति का नया आयाम

Bihar Election Result 2025
Bihar Election Result 2025: बिहार में नोटा मतों में वृद्धि, मतदाताओं की नाराज़गी का संकेत (FIle Photo)
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बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में नोटा का उभरता रुझान

चुनावी परिदृश्य में नोटा की भूमिका

बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के परिणामों ने राज्य की राजनीतिक दिशा को एक बार फिर बदल दिया है। एनडीए ने राज्य की 243 सीटों में से लगभग 200 सीटों पर बढ़त हासिल कर सत्ता में प्रचंड बहुमत के साथ वापसी दर्ज की है। हालांकि, इस चुनाव में एक और पहलू ऐसा रहा जिसने सभी का ध्यान आकर्षित किया – NOTA अर्थात उपरोक्त में से कोई नहीं का विकल्प।
चुनाव आयोग के ताज़ा आंकड़ों के अनुसार, इस बार 1.82 प्रतिशत मतदाताओं ने NOTA का बटन दबाया। कुल 8,93,213 लोगों ने अपनी नाराज़गी या असंतोष व्यक्त करते हुए किसी भी प्रत्याशी को चुनना उचित नहीं समझा। यह आंकड़ा 2020 में हुए 1.68 प्रतिशत NOTA वोटों की तुलना में अधिक है, जो मतदाताओं के रुझान में एक परिवर्तन की ओर संकेत करता है।

नोटा का इतिहास और महत्त्व

नोटा को इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन में सितंबर 2013 में सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद जोड़ा गया था। इससे पहले, वोट न देने की इच्छा रखने वाले मतदाताओं को फॉर्म 49-O भरना पड़ता था, जो मतदाता की गोपनीयता को भंग करता था। नोटा को EVM में एक स्वतंत्र विकल्प के रूप में जोड़ने से मतदाताओं को अपनी असहमति को गोपनीय तरीके से दर्ज कराने का अवसर मिला।
नोटा का प्रतीक एक काले क्रॉस के साथ एक मतपत्र है, जो इसे अन्य विकल्पों से अलग पहचान देता है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने यह निर्देश देने से इनकार कर दिया था कि यदि किसी निर्वाचन क्षेत्र में बहुमत NOTA को मिलता है, तो चुनाव रद्द किया जाए या फिर से कराया जाए।

2025 के चुनाव में नोटा की स्थिति

इस बार बिहार के कुल 7.45 करोड़ से अधिक पंजीकृत मतदाताओं में से 66.91 प्रतिशत ने मतदान किया। यह 1951 के पहले विधानसभा चुनाव के बाद बिहार में हुआ सबसे अधिक मतदान है। दिलचस्प बात यह है कि इस चुनाव में महिलाओं की भागीदारी ऐतिहासिक रूप से सबसे अधिक रही।
इन भारी मतदान के बीच 8.93 लाख से ज्यादा मतदाताओं ने NOTA का विकल्प चुना। हालांकि यह प्रतिशत पिछले चुनावों की तुलना में मामूली बढ़ोतरी दर्शाता है, लेकिन यह स्पष्ट करता है कि कुछ मतदाता अभी भी उपलब्ध प्रत्याशियों से असंतुष्ट हैं या विकल्पों की कमी महसूस करते हैं।

2020 और 2015 के चुनावों से तुलना

2020 में बिहार के विधानसभा चुनाव में 1.68 प्रतिशत अर्थात 7,06,252 मत NOTA में पड़े थे। इससे पहले 2015 के चुनावों में NOTA का प्रतिशत 2.48 था, जब 9.4 लाख मतदाताओं ने किसी भी प्रत्याशी पर भरोसा नहीं जताया था।
लोकसभा चुनाव 2024 में NOTA का प्रतिशत सबसे कम रहा, जो यह दर्शाता है कि राष्ट्रीय स्तर पर मतदाता अधिक निर्णायक रहे, जबकि राज्य चुनावों में अब भी असंतोष की अभिव्यक्ति अधिक दिखाई देती है।

राजनीतिक दलों के लिए संकेत

NOTA में हुई यह वृद्धि राजनीतिक दलों के लिए एक स्पष्ट संदेश है कि राज्य का एक वर्ग अभी भी उपलब्ध राजनीतिक विकल्पों से संतुष्ट नहीं है। चुनावी रणनीतियाँ, प्रत्याशी चयन और स्थानीय मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करना अब पहले से अधिक महत्वपूर्ण हो गया है।
नोटा भले ही चुनाव के परिणाम को सीधे प्रभावित नहीं करता, लेकिन इसका बढ़ता प्रतिशत इस बात का संकेत देता है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में नागरिकों की प्रतिक्रिया कितनी महत्व रखती है। मतदाताओं की यह मौन असहमति आने वाले वर्षों में राजनीतिक स्वरूप को प्रभावित कर सकती है।

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Asfi Shadab

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