ABHA Digital Health ID: डिजिटल हेल्थ का नया कीर्तिमान, 90 करोड़ के पार आभा आईडी

Health Records : आयुष्मान भारत डिजिटल मिशन के तहत देश में 90 करोड़ से अधिक आभा आईडी बन चुकी हैं। यह डिजिटल स्वास्थ्य क्षेत्र की बड़ी उपलब्धि है, हालांकि डेटा सुरक्षा, उपयोगिता और डिजिटल पहुंच जैसी चुनौतियां अब भी बनी हुई हैं।
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14 अंकों की एक अनूठी डिजिटल हेल्थ आईडी
ABHA Digital Health ID: भारत की डिजिटल स्वास्थ्य व्यवस्था ने एक ऐसी कामयाबी हासिल की है जिसे ऐतिहासिक कहा जाए तो गलत नहीं होगा। नेशनल हेल्थ अथॉरिटी के ताजा आंकड़ों के मुताबिक, आयुष्मान भारत डिजिटल मिशन के अंतर्गत देश में 90 करोड़ से अधिक ‘आभा’ (आयुष्मान भारत हेल्थ अकाउंट) आईडी बनाई जा चुकी हैं। यह आंकड़ा न सिर्फ चौंकाने वाला है, बल्कि भारत को दुनिया के सबसे बड़े डिजिटल स्वास्थ्य नेटवर्क के रूप में मजबूती से स्थापित भी करता है।
आभा मूल रूप से 14 अंकों की एक अनूठी डिजिटल हेल्थ आईडी है। इसका सीधा मकसद मरीजों को कागजी पर्चों, पुरानी फाइलों और रिपोर्टों को सहेजने के झंझट से मुक्ति दिलाना है। इस आईडी के जरिए कोई भी नागरिक अपने पूरे मेडिकल इतिहास (प्रिस्क्रिप्शन, लैब रिपोर्ट, डिस्चार्ज समरी आदि) को डिजिटल रूप से सुरक्षित रख सकता है। सबसे अच्छी बात यह है कि मरीज की मर्जी या ‘सहमति’ के बिना कोई भी डॉक्टर या अस्पताल इस डेटा को नहीं देख सकता।
उत्तर प्रदेश अव्वल, छोटे राज्यों ने भी मारी बाजी
अगर राज्यों के प्रदर्शन को देखें, तो आबादी के मामले में देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश ने 15.3 करोड़ से अधिक आईडी बनाकर सूची में पहला स्थान हासिल किया है। इसके बाद राजस्थान और महाराष्ट्र का नंबर आता है, जहां 7-7 करोड़ से ज्यादा आईडी बन चुकी हैं। बिहार (6.3 करोड़) और पश्चिम बंगाल (5.9 करोड़) भी इस रेस में पीछे नहीं हैं।

कुछ राज्यों का प्रदर्शन हैरान करने वाला
वहीं, अगर हम राज्य की कुल आबादी के अनुपात (कवरेज) की बात करें, तो कुछ राज्यों का प्रदर्शन हैरान करने वाला है:
आंध्र प्रदेश: यहां की लगभग 98.5% आबादी इस दायरे में आ चुकी है।
ओडिशा और चंडीगढ़: क्रमशः 91.9% और 90.8% की शानदार कवरेज।
शत-प्रतिशत लक्ष्य: अंडमान-निकोबार, लद्दाख, लक्षद्वीप और दादरा-नगर हवेली जैसे केंद्रशासित प्रदेशों ने लगभग पूरी आबादी को कवर कर लिया है।
आधी आबादी की हिस्सेदारी बेहद मजबूत
इस पूरी मुहिम में आधी आबादी की हिस्सेदारी बेहद मजबूत है। कुल आभा कार्डधारकों में लगभग 49.75% महिलाएं हैं, जो यह दिखाता है कि डिजिटल स्वास्थ्य का लाभ समाज के हर वर्ग तक समान रूप से पहुंच रहा है। नेशनल हेल्थ अथॉरिटी के सीईओ डॉ. सुनील कुमार बरनवाल इस उपलब्धि को नागरिकों और स्वास्थ्य क्षेत्र के बीच बढ़ते भरोसे का प्रतीक मानते हैं। लेकिन इस भारी-भरकम संख्या के बीच कुछ बुनियादी और गंभीर सवाल भी खड़े होते हैं, जिन पर बात करना जरूरी है:
असली कामयाबी कब मानी जाएगी ?
विशेषज्ञों का मानना है कि सिर्फ आईडी बना लेना सफलता की गारंटी नहीं है। असली कामयाबी तब मानी जाएगी जब लोग अस्पतालों में पर्ची कटाने से लेकर डॉक्टर को दिखाने तक, नियमित रूप से इस डिजिटल सिस्टम का इस्तेमाल शुरू करेंगे।
डेटा सुरक्षा की बड़ी चिंता
मेडिकल रिकॉर्ड किसी भी इंसान की सबसे निजी जानकारी होती है। डिजिटल राइट्स एक्सपर्ट्स का कहना है कि जब तक डेटा सुरक्षा और गोपनीयता के नियमों को जमीनी स्तर पर बेहद कड़ा नहीं किया जाता, तब तक करोड़ों लोगों के इस संवेदनशील डेटा पर जोखिम बना रहेगा। सरकार को यह भरोसा दिलाना होगा कि यह सिस्टम पूरी तरह से ‘हैक-प्रूफ’ है।
डिजिटल विभाजन
ABHA Digital Health ID: आज भी हमारे गांवों में, बुजुर्गों में या कम पढ़े-लिखे लोगों में स्मार्टफोन और तकनीक को लेकर एक झिझक है। जब तक स्वास्थ्य कर्मियों और आम जनता को इसका आसान प्रशिक्षण नहीं मिलेगा, तब तक यह योजना कागजों से निकलकर हर गरीब के काम नहीं आ सकेगी।
90 करोड़ का आंकड़ा पार करना यकीनन भारतीय स्वास्थ्य तंत्र की एक बहुत बड़ी छलांग है। यह साफ करता है कि देश बदलाव के लिए तैयार है। लेकिन इस डिजिटल क्रांति की असली परीक्षा इस बात से होगी कि क्या यह एक आम नागरिक को इलाज के खर्च में राहत दे पाती है, क्या इससे डॉक्टरों को सही समय पर सही जानकारी मिलती है, और क्या मरीज का डेटा सचमुच सुरक्षित रहता है। आने वाले समय में यही कसौटियाँ तय करेंगी कि यह मिशन सिर्फ एक रिकॉर्ड बनकर रह जाता है या देश की सेहत सुधारने का सबसे बड़ा जरिया बनता है।

