Kids Screen Time: बच्चे को चुप कराने के लिए मोबाइल दे रहे हैं?

Mobile Addiction : छोटे बच्चों को लंबे समय तक मोबाइल या टैबलेट देना उनकी रोजमर्रा की सीखने वाली गतिविधियों को प्रभावित कर सकता है। विशेषज्ञ 2 से 5 साल की उम्र में स्क्रीन टाइम सीमित रखने, सोने से पहले मोबाइल बंद करने और बच्चों के साथ बातचीत, खेल व किताब पढ़ने का समय बढ़ाने की सलाह देते हैं।
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ज्यादा स्क्रीन टाइम बोलने और सीखने की रफ्तार पर डाल सकता है असर
Kids Screen Time: आजकल छोटे बच्चों को मोबाइल या टैबलेट देकर शांत कराना आम बात हो गई है। खाना खिलाना हो, बच्चा रो रहा हो या माता-पिता किसी काम में व्यस्त हों-कई बार मोबाइल सबसे आसान उपाय लगता है। लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि छोटे बच्चों का लंबे समय तक स्क्रीन देखना उनकी रोजमर्रा की उन गतिविधियों का समय कम कर सकता है, जो भाषा और सामाजिक विकास के लिए जरूरी हैं। खासकर दो से पांच साल की उम्र में बच्चों को मोबाइल पर लगातार वीडियो देखने की आदत से बचाना जरूरी है। विश्व स्वास्थ्य संगठन यानी डब्ल्यूएचओ के अनुसार, दो साल के बच्चों के लिए मनोरंजन वाला स्क्रीन टाइम एक घंटे से ज्यादा नहीं होना चाहिए। तीन और चार साल के बच्चों के लिए भी इसे करीब एक घंटे तक सीमित रखने की सलाह दी जाती है।
मोबाइल से ज्यादा जरूरी है बच्चे से बात करना
बाल रोग विशेषज्ञों के मुताबिक, इस उम्र में बच्चा सिर्फ वीडियो देखकर नहीं सीखता। वह सबसे ज्यादा माता-पिता से बातचीत, खेल, कहानी सुनने, किताब देखने और आसपास की चीजों को देखकर सीखता है। अगर बच्चा रोज कई घंटे मोबाइल पर वीडियो देखता रहता है तो उसके पास माता-पिता से बातचीत करने, सवाल पूछने, जवाब सुनने और खेल के जरिए नई चीजें सीखने का समय कम हो सकता है। यही वजह है कि विशेषज्ञ स्क्रीन टाइम को सिर्फ मोबाइल या टीवी की समस्या नहीं मानते, बल्कि इसे बच्चे की पूरी दिनचर्या से जोड़कर देखते हैं।
तेजी से बदलते वीडियो क्यों चिंता बढ़ाते हैं?
आजकल मोबाइल पर छोटे-छोटे वीडियो और रील्स तेजी से बदलते रहते हैं। कुछ सेकंड में नया चेहरा, नई आवाज और नया दृश्य सामने आ जाता है। रोहिणी स्थित डॉ. बाबा साहेब आंबेडकर अस्पताल के वरिष्ठ रेजिडेंट बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. राहुल दराल के अनुसार, इस तरह के तेजी से बदलते वीडियो बच्चों को लगातार उत्तेजित करते हैं। हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि बच्चे की एकाग्रता कम होने के लिए केवल रील्स या शॉर्ट वीडियो को जिम्मेदार नहीं माना जा सकता। बच्चे की नींद कैसी है, वह कितना खेलता है, घर का माहौल कैसा है और माता-पिता उसके साथ कितना समय बिताते हैं—इन सभी चीजों का असर बच्चे के विकास पर पड़ सकता है।
ढाई साल का बच्चा रोज 6-7 घंटे देखता था मोबाइल
डॉ. दराल ने एक ढाई साल के बच्चे का उदाहरण बताया, जो रोजाना करीब छह से सात घंटे स्मार्टफोन पर कार्टून और छोटे वीडियो देखता था। चिंता की बात यह थी कि बच्चा इस उम्र में केवल कुछ ही शब्द बोल पा रहा था। जब उसकी जांच की गई तो उसकी सुनने, देखने और विकास से जुड़ी दूसरी क्षमताएं सामान्य पाई गईं। इसके बाद माता-पिता को बच्चे का स्क्रीन टाइम कम करने की सलाह दी गई। उन्हें कहा गया कि बच्चे को मोबाइल देने के बजाय उसके साथ बातचीत करें, इंटरैक्टिव खेल खेलें और चित्रों वाली किताबें पढ़ें। स्क्रीन कम करने और बच्चे के साथ ज्यादा समय बिताने के बाद उसके विकास में सुधार देखने को मिला। यह उदाहरण यह बताता है कि बच्चे के विकास में सिर्फ स्क्रीन हटाना ही नहीं, बल्कि उसकी जगह सही गतिविधियां देना भी जरूरी है।
बच्चे को मोबाइल से दूर रखना है तो विकल्प भी दें
अक्सर माता-पिता बच्चे का मोबाइल अचानक बंद कर देते हैं। लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि केवल मोबाइल छीन लेना पर्याप्त नहीं है। बच्चे को उसकी जगह कुछ ऐसा देना जरूरी है, जिसमें उसका मन लगे।

माता-पिता बच्चे के साथ:
- चित्रों वाली किताब पढ़ सकते हैं।
- कहानी सुना सकते हैं।
- खिलौनों के साथ खेल सकते हैं।
- बच्चे से सवाल-जवाब कर सकते हैं।
- उसे बाहर खेलने के लिए ले जा सकते हैं।
- घर के छोटे-छोटे कामों में शामिल कर सकते हैं।
- गाना और कविताएं सुना सकते हैं।
इन गतिविधियों से बच्चे को बातचीत करने और नई चीजें सीखने के ज्यादा मौके मिलते हैं।
अमेरिकी बाल चिकित्सा अकादमी की भी यही सलाह
अमेरिकी बाल चिकित्सा अकादमी भी दो से पांच साल के बच्चों के लिए स्क्रीन के इस्तेमाल को सीमित रखने की सलाह देती है। उसके अनुसार, इस उम्र में करीब एक घंटे प्रतिदिन तक उच्च गुणवत्ता वाली सामग्री दिखाई जा सकती है और माता-पिता को बच्चे के साथ बैठकर उसे देखना चाहिए। इसका फायदा यह है कि बच्चा जो देख रहा है, उसके बारे में माता-पिता उससे बात कर सकते हैं। उदाहरण के लिए अगर वीडियो में कोई जानवर है तो माता-पिता पूछ सकते हैं-यह कौन सा जानवर है? इसका रंग क्या है? यह क्या कर रहा है? इस तरह स्क्रीन देखने की गतिविधि भी बातचीत और सीखने का माध्यम बन सकती है।
सोने से पहले मोबाइल बिल्कुल नहीं
विशेषज्ञों की एक और महत्वपूर्ण सलाह है कि बच्चे को सोने से कम से कम एक घंटे पहले स्क्रीन बंद कर देनी चाहिए। बच्चे के शयनकक्ष को स्क्रीन-मुक्त रखना बेहतर माना जाता है। इसी तरह खाना खाते समय भी मोबाइल या टैबलेट देने से बचना चाहिए। अगर बच्चा खाना खाते समय हमेशा वीडियो देखता है तो धीरे-धीरे उसे बिना स्क्रीन के खाना खाने में परेशानी हो सकती है।
रोज बाहर खेलना भी जरूरी
बच्चों के लिए सिर्फ पढ़ाई और स्क्रीन ही जरूरी नहीं है। उन्हें रोज शारीरिक गतिविधि के लिए भी समय चाहिए। दौड़ना, खेलना, साइकिल चलाना, पार्क में जाना या दूसरे बच्चों के साथ खेलना बच्चे के शारीरिक और सामाजिक विकास में मदद करता है। इसलिए विशेषज्ञों की सलाह है कि दिन की ऐसी दिनचर्या बनाई जाए जिसमें स्क्रीन के साथ-साथ खेल, नींद, पढ़ाई, बातचीत और परिवार का समय भी शामिल हो।
क्या मोबाइल पूरी तरह बंद कर देना चाहिए?
Kids Screen Time: विशेषज्ञों के मुताबिक, समाधान मोबाइल को पूरी तरह छीन लेना नहीं है। आज की दुनिया में डिजिटल उपकरण बच्चों की जिंदगी का हिस्सा बन चुके हैं। जरूरी यह है कि बच्चों में स्वस्थ डिजिटल आदतें विकसित की जाएं। माता-पिता यह तय कर सकते हैं कि बच्चा कब मोबाइल देखेगा, कितनी देर देखेगा और क्या देखेगा। साथ ही कोशिश होनी चाहिए कि बच्चा मोबाइल पर अकेले लगातार वीडियो न देखता रहे।
छोटे बच्चे को शांत कराने के लिए रोज कई घंटे मोबाइल देना आसान रास्ता जरूर है, लेकिन यह अच्छी आदत नहीं है। दो से पांच साल की उम्र में बच्चे का असली विकास सिर्फ स्क्रीन से नहीं, बल्कि माता-पिता से बातचीत, खेल, कहानी, किताब और आसपास की दुनिया को समझने से होता है। इसलिए मोबाइल पूरी तरह छीनने के बजाय उसकी सीमा तय करें। खाने और सोने के समय स्क्रीन बंद रखें, सोने से कम से कम एक घंटे पहले मोबाइल हटा दें और बच्चे के साथ रोज कुछ समय बातचीत और खेल में जरूर बिताएं। सबसे जरूरी बात-बच्चे को स्क्रीन से हटाने का सबसे अच्छा तरीका सिर्फ ‘नहीं’ कहना नहीं, बल्कि उसकी जगह अपने समय और ध्यान को देना है।

