आसमान छूने की तैयारी, जमीन पर टैलेंट की तलाश

भारत का स्पेस सेक्टर तेजी से बढ़ रहा है, लेकिन क्या इसके साथ जरूरी विशेषज्ञ प्रतिभाएं भी तैयार हो रही हैं? क्या प्रोपल्शन, एवियोनिक्स, रडार और सैटेलाइट सिस्टम जैसे क्षेत्रों में कुशल इंजीनियरों की कमी भारत की अंतरिक्ष महत्वाकांक्षाओं के सामने चुनौती बन रही है? 440 स्पेस-टेक स्टार्टअप, बढ़ते निजी निवेश और 2033 तक 44 अरब डॉलर की स्पेस इकोनॉमी के अनुमान के बीच आखिर भारत को कितने कुशल लोगों की जरूरत होगी?
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स्पेस सेक्टर में बढ़ा स्किल गैप
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन यानी इसरो के साथ अब निजी कंपनियां और स्टार्टअप भी रॉकेट, सैटेलाइट और दूसरी अंतरिक्ष तकनीकों के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। सरकारी आंकड़ों के अनुसार देश में करीब 440 स्पेस-टेक स्टार्टअप पंजीकृत हैं। हालांकि, तेजी से बढ़ते इस क्षेत्र के सामने अब विशेषज्ञ और प्रशिक्षित प्रतिभाओं की कमी बड़ी चुनौती बनकर उभर रही है। प्रोपल्शन, एवियोनिक्स, सैटेलाइट सिस्टम, रडार, ऑटोनॉमस तकनीक और सर्टिफिकेशन जैसे क्षेत्रों में अनुभवी इंजीनियरों और तकनीकी विशेषज्ञों की मांग तेजी से बढ़ रही है।
सरकार भी भारत की स्पेस इकोनॉमी को आने वाले वर्षों में बड़े स्तर तक ले जाने की तैयारी कर रही है। सरकारी अनुमानों के अनुसार भारत की स्पेस इकोनॉमी 2033 तक करीब 44 अरब डॉलर और 2040 तक करीब 100 अरब डॉलर तक पहुंच सकती है। ऐसे में इस क्षेत्र के लिए पर्याप्त और विशेषज्ञ मानव संसाधन तैयार करना अहम हो गया है।
पहला स्पेस-टेक यूनिकॉर्न स्काईरूट
वर्ष 2020 में अंतरिक्ष क्षेत्र को निजी कंपनियों के लिए खोलने के बाद निवेश में भी तेजी आई है। उपलब्ध सरकारी आंकड़ों के अनुसार 2021-22 में निजी निवेश करीब 10.05 करोड़ डॉलर था, जो 31 मार्च 2026 तक बढ़कर 61.85 करोड़ डॉलर हो गया। वर्ष 2026 में अब तक करीब 18.7 करोड़ डॉलर के निवेश की जानकारी सामने आई है। निजी क्षेत्र की बढ़ती क्षमता का एक बड़ा उदाहरण स्काईरूट एयरोस्पेस है। जुलाई 2026 में कंपनी के विक्रम-1 रॉकेट ने श्रीहरिकोटा से सफलतापूर्वक उड़ान भरकर कक्षा हासिल की। इसे भारत के निजी क्षेत्र द्वारा विकसित पहला ऑर्बिटल रॉकेट बताया गया। मई 2026 में स्काईरूट करीब 1.1 अरब डॉलर के मूल्यांकन के साथ भारत का पहला स्पेस-टेक यूनिकॉर्न भी बना।
निजी क्षेत्र की बढ़ती भूमिका का एक और उदाहरण तमिलनाडु के कुलसेकरपट्टिनम में बन रहा लॉन्च कॉम्प्लेक्स है। भारतीय राष्ट्रीय अंतरिक्ष संवर्धन एवं प्राधिकरण केंद्र यानी इन-स्पेस ने करीब 986 करोड़ रुपये की लागत वाले स्मॉल सैटेलाइट लॉन्च कॉम्प्लेक्स के संचालन और प्रबंधन के लिए योग्य भारतीय संस्थाओं से एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट मांगा है। यह परिसर इसरो द्वारा विकसित किए जा रहे भारत के दूसरे स्पेसपोर्ट का हिस्सा है और मुख्य रूप से छोटे रॉकेटों के प्रक्षेपण के लिए तैयार किया जा रहा है।
2 लाख से अधिक रोजगार की जरूरत
निजी स्पेस कंपनियों के विस्तार के साथ विशेषज्ञ प्रतिभाओं की मांग भी तेजी से बढ़ रही है। उद्योग से जुड़े विशेषज्ञों के अनुसार चुनौती केवल स्नातकों की संख्या की नहीं है। बड़ी समस्या यह है कि बहुत से युवाओं को वास्तविक अंतरिक्ष यान, लॉन्च व्हीकल, परीक्षण, निर्माण और मिशन से जुड़े वातावरण में काम करने का पर्याप्त व्यावहारिक अनुभव नहीं मिलता। भारतीय अंतरिक्ष संघ के अनुसार व्यापक स्पेस इकोसिस्टम में भविष्य में दो लाख से अधिक रोजगार की जरूरत पड़ सकती है। ऐसे में तकनीकी शिक्षा और उद्योग की जरूरतों के बीच दूरी कम करना जरूरी होगा। क्वेस कॉर्प के आंकड़ों के अनुसार फ्लाइट मैकेनिक्स और स्ट्रेस एनालिसिस में करीब 20 से 25 प्रतिशत तक प्रतिभा की कमी है।
वहीं यूएवी और रोबोटिक्स से जुड़ी 40 से 45 प्रतिशत भूमिकाएं लक्षित री-स्किलिंग के अभाव में खाली रह सकती हैं। 2025 से 2030 के बीच ऑटोनॉमस सिस्टम, एज एआई, क्वांटम और हाइपरसोनिक्स जैसी उभरती तकनीकों में मांग और उपलब्ध प्रतिभा के बीच करीब 35 प्रतिशत अंतर का अनुमान लगाया गया है। हालांकि, ये आंकड़े सरकारी आंकड़े नहीं, बल्कि उद्योग से जुड़े अनुमान हैं।
सरकारी क्षेत्र में भी प्रतिभाओं की कमी
विशेषज्ञ प्रतिभाओं की कमी का असर सरकारी क्षेत्र में भी दिखाई दे रहा है। 2025-26 के अंत में अंतरिक्ष विभाग में 20,269 स्वीकृत पदों में से केवल 14,637 पद भरे हुए थे। यानी 5,632 पद खाली थे और कुल स्वीकृत पदों में करीब 72.2 प्रतिशत ही भरे थे। 2001-02 में विभाग में 16,423 स्वीकृत पदों के मुकाबले 14,847 कर्मचारी कार्यरत थे। उस समय रिक्तियों की दर 10 प्रतिशत से कम थी।
आंकड़ों की यह तुलना बताती है कि पिछले वर्षों की तुलना में मानव संसाधन की चुनौती बढ़ी है। स्पेस सेक्टर की बढ़ती जरूरतों को देखते हुए अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद यानी एआईसीटीई और इन-स्पेस ने स्पेस टेक्नोलॉजी माइनर कोर्स जैसी पहल शुरू की है। इसका उद्देश्य तकनीकी शिक्षा में अंतरिक्ष से जुड़े विषयों को शामिल करना और छात्रों को शुरुआती स्तर पर इस क्षेत्र के लिए तैयार करना है।
किताबों और कक्षा की पढ़ाई से नहीं चलेगा काम
विशेषज्ञों का मानना है कि केवल किताबों और कक्षा आधारित शिक्षा से स्पेस सेक्टर की जरूरत पूरी नहीं होगी। मिशन-आधारित लर्निंग, उद्योग और विश्वविद्यालयों के बीच मजबूत सहयोग, संरचित इंटर्नशिप, प्रयोगशाला आधारित प्रशिक्षण, हैकाथॉन, फेलोशिप और स्पेस कंपनियों में व्यावहारिक अनुभव बढ़ाना होगा। उद्योग से जुड़े लोगों का कहना है कि भारत के पास बड़ी इंजीनियरिंग प्रतिभा है, लेकिन उसे अंतरिक्ष क्षेत्र की विशिष्ट जरूरतों के अनुरूप तैयार करने की आवश्यकता है। खासकर प्रोपल्शन, एवियोनिक्स, सैटेलाइट सिस्टम, रडार, क्वांटम, हाइपरसोनिक्स और सर्टिफिकेशन जैसे क्षेत्रों में विशेषज्ञता विकसित करना जरूरी होगा।
भारत के स्पेस सेक्टर के सामने अब चुनौती केवल रॉकेट और सैटेलाइट बनाने की नहीं है। असली चुनौती ऐसे प्रशिक्षित और अनुभवी मानव संसाधन तैयार करने की है, जो डिजाइन से लेकर परीक्षण, निर्माण और मिशन संचालन तक पूरी प्रक्रिया को संभाल सकें। यदि भारत को अपनी स्पेस इकोनॉमी को 2033 तक 44 अरब डॉलर और आगे 100 अरब डॉलर के स्तर तक ले जाना है, तो निजी निवेश और तकनीकी बुनियादी ढांचे के साथ-साथ कुशल और विशेषज्ञ प्रतिभाओं का मजबूत आधार तैयार करना भी उतना ही महत्वपूर्ण होगा।

