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इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला! किन्नरों को ‘नेग’ मांगने का कानूनी अधिकार नहीं, जबरन वसूली अपराध

इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला! किन्नरों को ‘नेग’ मांगने का कानूनी अधिकार नहीं, जबरन वसूली अपराध
इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला! किन्नरों को ‘नेग’ मांगने का कानूनी अधिकार नहीं, जबरन वसूली अपराध (सांकेतिक तस्वीर)

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि किन्नर समुदाय को ‘नेग’ या ‘बधाई’ के नाम पर धन वसूली का कानूनी अधिकार नहीं है। कोर्ट ने कहा कि बिना वैधानिक आधार के ऐसी वसूली आपराधिक कृत्य मानी जाएगी। परंपरा के आधार पर इसे मौलिक अधिकार नहीं माना जा सकता।

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Dipali Kumari
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Transgender Neag Rights: इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने एक अहम फैसले में साफ कर दिया है कि किन्नर (ट्रांसजेंडर) समुदाय को पारंपरिक ‘बधाई’ या ‘नेग’ के नाम पर पैसे मांगने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है। कोर्ट ने कहा कि अगर कोई व्यक्ति जबरन इस तरह धन वसूलता है, तो इसे कानूनन सही नहीं माना जा सकता और यह आपराधिक कृत्य की श्रेणी में आ सकता है।

क्या था पूरा मामला?

दरअसल गोंडा जिले की रहने वाली रेखा देवी नाम की एक किन्नर ने कोर्ट में याचिका दाखिल की थी। रेखा देवी की मांग थी कि उन्हें एक तय क्षेत्र दिया जाए, जहां सिर्फ वही ‘बधाई नेग’ मांग सकें। उनका कहना था कि वह कई वर्षों से एक खास इलाके में यह काम कर रही हैं, लेकिन अब दूसरे किन्नर समूह भी वहां पहुंच जाते हैं, जिससे विवाद और झगड़े होते हैं।

याचिका में उन्होंने कोर्ट से मांग की थी कि उनके पुराने क्षेत्र को परंपरागत अधिकार मानते हुए कानूनी सुरक्षा दी जाए, ताकि दूसरे समूह वहां न आएं।

कोर्ट ने क्या कहा?

न्यायमूर्ति आलोक माथुर और न्यायमूर्ति अमिताभ कुमार राय की पीठ ने इस मांग को खारिज कर दिया। कोर्ट ने बहुत स्पष्ट शब्दों में कहा कि किसी भी व्यक्ति या समुदाय को बिना कानूनी आधार के टैक्स, शुल्क या धन वसूलने का अधिकार नहीं दिया जा सकता।

कोर्ट ने कहा कि ‘नेग’ या ‘बधाई’ मांगना अगर स्वेच्छा से मिले सम्मान तक सीमित है तो अलग बात है, लेकिन इसे अधिकार बताकर किसी क्षेत्र में वसूली का दावा करना कानूनन मान्य नहीं है।

परंपरा बनाम कानून

अदालत ने यह भी कहा कि ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के अधिकारों के संरक्षण अधिनियम 2019 में भी ऐसा कोई प्रावधान नहीं है, जो बधाई या नेग वसूली को कानूनी अधिकार बनाता हो। इसलिए केवल परंपरा के आधार पर इसे मौलिक अधिकार नहीं माना जा सकता।

इस निर्णय का मतलब यह नहीं कि ट्रांसजेंडर समुदाय के सम्मान या अधिकार कम किए गए हैं, बल्कि कोर्ट ने साफ किया कि हर नागरिक की तरह उनके अधिकार भी कानून के दायरे में ही तय होंगे।

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Dipali Kumari

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दीपाली कुमारी सक्रिय पत्रकार और हिंदी कंटेंट राइटर हैं, जिन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में तीन वर्षों का अनुभव है। उन्होंने रांची के गोस्सनर कॉलेज से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की है। सामाजिक सरोकारों, जन-जागरूकता और जमीनी मुद्दों पर तथ्यपरक एवं संवेदनशील लेखन उनकी प्रमुख पहचान है। आम लोगों की आवाज़ को मुख्यधारा तक पहुँचाना और समाज से जुड़े महत्वपूर्ण विषयों को प्रभावशाली तरीके से प्रस्तुत करना उनकी पत्रकारिता का मुख्य उद्देश्य है। अनुभव : पिछले तीन वर्षों से वे सक्रिय पत्रकारिता और डिजिटल कंटेंट लेखन से जुड़ी हुई हैं। इस दौरान उन्होंने सामाजिक मुद्दों, जनहित विषयों और स्थानीय समस्याओं पर लगातार लेखन किया है। उनकी रिपोर्टिंग और लेखन शैली जमीनी समझ, स्पष्ट प्रस्तुति और पाठक-केंद्रित दृष्टिकोण को दर्शाती है। वर्तमान फोकस : वे समाज, शिक्षा, महिला सशक्तिकरण, जन-जागरूकता और सामाजिक बदलाव से जुड़े विषयों पर लेखन करती हैं। उनकी प्राथमिकता ऐसी खबरें और लेख तैयार करना है, जो आम लोगों से सीधे जुड़ाव बनाएं और सकारात्मक सामाजिक प्रभाव उत्पन्न करें। मुख्य विशेषज्ञता (Core Expertise) : • सामाजिक मुद्दों पर लेखन : जनहित, सामाजिक बदलाव और आम लोगों से जुड़े विषयों पर संवेदनशील और प्रभावशाली रिपोर्टिंग। • जमीनी रिपोर्टिंग : स्थानीय समस्याओं और वास्तविक परिस्थितियों को सरल एवं स्पष्ट भाषा में प्रस्तुत करना। • जन-जागरूकता आधारित कंटेंट : शिक्षा, महिला सशक्तिकरण और सामाजिक जागरूकता से जुड़े विषयों पर जानकारीपूर्ण लेखन। • हिंदी कंटेंट निर्माण : पाठकों के लिए सहज, विश्वसनीय और प्रभावी हिंदी कंटेंट तैयार करने में विशेषज्ञता। विश्वसनीयता का आधार (Credibility Signal) : जमीनी मुद्दों की गहरी समझ, निष्पक्ष दृष्टिकोण और समाज-केंद्रित लेखन शैली ने दीपाली कुमारी को एक संवेदनशील और भरोसेमंद हिंदी पत्रकार के रूप में स्थापित किया है। जनहित से जुड़े विषयों पर उनकी निरंतर सक्रियता और तथ्यपरक लेखन उनकी विश्वसनीयता को मजबूत बनाते हैं।