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सर्वोच्च न्यायालय में मुख्य न्यायाधीश पर जूता फेंके जाने की घटना पर तेजस्वी यादव बोले – “यह संविधान और बाबा साहेब अंबेडकर का अपमान है”

सर्वोच्च न्यायालय में मुख्य न्यायाधीश पर जूता फेंके जाने की घटना पर तेजस्वी यादव बोले – “यह संविधान और बाबा साहेब अंबेडकर का अपमान है”
Tejashwi Yadav condemns the shocking incident of shoe thrown at the CJI in Supreme Court, says “It’s not just an insult to the Chief Justice, it’s an attack on the Constitution and Baba Saheb Ambedkar.”
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Aryan Ambastha
Aryan Ambastha
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सर्वोच्च न्यायालय में शर्मनाक घटना, मुख्य न्यायाधीश पर फेंका गया जूता

देश की न्यायपालिका में सोमवार को एक बेहद शर्मनाक घटना घटी जब सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश (CJI) पर सुनवाई के दौरान किसी व्यक्ति ने जूता फेंक दिया। यह घटना अदालत की मर्यादा और लोकतांत्रिक व्यवस्था दोनों पर प्रश्नचिह्न लगाती है। इस कृत्य की देशभर में कड़ी निंदा हो रही है।

तेजस्वी यादव का तीखा बयान: “यह संविधान पर हमला है”

बिहार विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष श्री तेजस्वी यादव ने इस घटना पर गहरी नाराजगी जताते हुए कहा कि,

“आज सर्वोच्च न्यायालय में ही मुख्य न्यायाधीश पर जूता फेंका गया। यह हमारे लोकतांत्रिक और न्यायिक इतिहास की एक शर्मनाक घटना है। जब देश के सर्वोच्च न्यायिक पद पर बैठे व्यक्ति को न्यायालय में ही इस तरह के अपमान का सामना करना पड़े, तो यह गंभीर चिंता का विषय है।”

उन्होंने कहा कि यह घटना केवल एक व्यक्ति पर नहीं, बल्कि भारत के संविधान और उसके मूल मूल्यों पर सीधा प्रहार है।

“संविधान के शिल्पकार बाबा साहेब अंबेडकर का भी अपमान”

तेजस्वी यादव ने कहा कि यह जूता मुख्य न्यायाधीश पर नहीं, बल्कि उस संविधान पर फेंका गया है, जिसे बाबा साहेब अंबेडकर ने देश को दिया था।
उन्होंने कहा –

“क्या दलित समुदाय से आने वाले और संविधान की भावना का पालन करने वाले व्यक्ति भी संवैधानिक पदों पर सुरक्षित नहीं हैं? यह जूता हमारे पूजनीय बाबा साहेब अंबेडकर पर फेंका गया है।”

उन्होंने आरोप लगाया कि धर्म और जाति के नाम पर समाज में फैलाए जा रहे जहर का यह सीधा परिणाम है।

“2014 के बाद से नफरत को सामान्य बना दिया गया”

तेजस्वी यादव ने अपने बयान में वर्ष 2014 के बाद देश के वातावरण में आए बदलाव की ओर इशारा किया। उन्होंने कहा कि सत्ता के संरक्षण में देश में नफरत और हिंसा को सामान्य बना दिया गया है।

“2014 के बाद जिस तरीके से राजकीय संरक्षण में घृणा और हिंसा को नॉर्मलाइज किया गया है, यह उसका ही दुष्परिणाम है।”

उन्होंने कहा कि जब समाज में डर और असहिष्णुता को बढ़ावा दिया जाता है, तो उसका असर न्यायपालिका और संवैधानिक संस्थाओं तक पहुंच जाता है, जो लोकतंत्र के लिए खतरनाक है।

“संविधान विरोधी ताकतें मौन क्यों हैं?”

तेजस्वी यादव ने भारतीय जनता पार्टी पर निशाना साधते हुए कहा कि इस तरह की संविधान और दलित विरोधी घटनाओं पर भाजपाई नेताओं की चुप्पी यह दर्शाती है कि वे असली मुद्दों से किनारा कर रहे हैं।
उन्होंने कहा –

“संविधान व दलित विरोधी भाजपाई इस घटना पर चुप क्यों हैं? न्यायपालिका की गरिमा हमारे लोकतंत्र की रीढ़ है – इसे बचाना हम सभी की जिम्मेदारी है।”

न्यायपालिका की गरिमा पर मंडराता खतरा

विशेषज्ञों का मानना है कि यह घटना केवल एक व्यक्ति के असंतोष का प्रदर्शन नहीं है, बल्कि न्यायपालिका की प्रतिष्ठा पर सीधा प्रहार है। अदालतें देश के लोकतांत्रिक ढांचे का सबसे अहम स्तंभ हैं, और इस प्रकार की हरकतें न्याय व्यवस्था की गरिमा को ठेस पहुंचाती हैं।

लोकतंत्र की असली परीक्षा

यह घटना भारत के लोकतंत्र और उसकी सहिष्णुता की एक गंभीर परीक्षा है। संविधान का सम्मान केवल न्यायपालिका का नहीं, बल्कि हर नागरिक का कर्तव्य है। इस घटना ने एक बार फिर याद दिलाया है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और असहमति का प्रदर्शन कभी भी हिंसक या अपमानजनक नहीं होना चाहिए।

तेजस्वी यादव का बयान इस घटना को केवल न्यायिक अपमान के रूप में नहीं बल्कि सामाजिक और वैचारिक चेतावनी के रूप में प्रस्तुत करता है। यह घटना हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या हम उस भारत की ओर बढ़ रहे हैं, जहां संविधान, न्याय और समानता केवल पुस्तकों तक सीमित रह जाएंगी।


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