Drought Risk India: अल नीनो का अलार्म, महंगाई डायन फिर सताएगी

Kharif Crops 2026 : में कमजोर मानसून और अल नीनो के कारण भारत के कई हिस्सों में सूखे जैसी स्थिति बन सकती है। इसका असर कृषि उत्पादन, किसानों की आय, खाद्य कीमतों और देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ने की आशंका है। सरकार ने संभावित संकट से निपटने के लिए आकस्मिक योजनाएं तैयार की हैं।
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सरकार ने शुरू की तैयारी, 197 जिले संवेदनशील घोषित
Drought Risk India: भारत में मानसून केवल एक मौसम नहीं, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था, कृषि व्यवस्था और करोड़ों लोगों की आजीविका की धुरी है। हर वर्ष किसानों की उम्मीदें मानसून की पहली बारिश के साथ जुड़ी होती हैं, लेकिन इस बार मौसम के संकेत चिंता बढ़ाने वाले हैं। भारतीय मौसम विभाग ने जून से सितंबर 2026 के दौरान सामान्य से कम वर्षा होने की आशंका जताई है। अनुमान है कि मानसून कमजोर रह सकता है, जिससे देश के लगभग 25 प्रतिशत हिस्से में सूखे जैसी परिस्थितियां पैदा होने का खतरा मंडरा रहा है। इसका असर केवल खेतों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि खाद्य उत्पादन, ग्रामीण आय, बाजार और आम लोगों की जेब तक महसूस किया जा सकता है।
अल नीनो ने बढ़ाई चिंता
– अल नीनो एक प्राकृतिक जलवायु घटना है, जो प्रशांत महासागर में समुद्री तापमान के असामान्य रूप से बढ़ने के कारण उत्पन्न होती है। जब भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी हिस्से का पानी सामान्य से अधिक गर्म हो जाता है, तब वैश्विक मौसम चक्र में बड़े बदलाव देखने को मिलते हैं।
– सामान्य परिस्थितियों में समुद्री हवाएं गर्म जल को एशिया और ऑस्ट्रेलिया की ओर धकेलती हैं, लेकिन अल नीनो के दौरान ये हवाएं कमजोर पड़ जाती हैं। परिणामस्वरूप वर्षा का संतुलन बिगड़ जाता है। दुनिया के कुछ हिस्सों में बाढ़ आती है, जबकि कई क्षेत्रों को सूखे और भीषण गर्मी का सामना करना पड़ता है।
– भारत में अल नीनो को अक्सर कमजोर दक्षिण-पश्चिम मानसून से जोड़ा जाता है। यही कारण है कि मौसम वैज्ञानिक और कृषि विशेषज्ञ इसकी गतिविधियों पर लगातार नजर बनाए रखते हैं। इतिहास गवाह है कि देश के कई बड़े सूखे अल नीनो वर्षों में दर्ज किए गए हैं।
राज्यों के लिए आकस्मिक योजनाएं तैयार
संभावित खतरे को देखते हुए केंद्र सरकार ने पहले से ही तैयारी शुरू कर दी है। कृषि मंत्रालय ने देशभर के 197 ऐसे जिलों की पहचान की है, जहां अल नीनो का असर सबसे अधिक पड़ सकता है। इन क्षेत्रों में सिंचाई सुविधाएं सीमित हैं और खेती काफी हद तक मानसूनी बारिश पर निर्भर करती है। सरकार किसानों तक समय पर मौसम संबंधी चेतावनियां पहुंचाने, फसल प्रबंधन की सलाह देने और वैकल्पिक कृषि उपायों को बढ़ावा देने पर जोर दे रही है। राज्यों के लिए अलग-अलग आकस्मिक योजनाएं तैयार की गई हैं ताकि बारिश की कमी होने पर तुरंत राहत और सहायता उपलब्ध कराई जा सके। इसके अलावा खाद्यान्न भंडारण, उर्वरकों की उपलब्धता और कृषि आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत बनाने के लिए भी कदम उठाए जा रहे हैं। सरकार का दावा है कि देश में पर्याप्त खाद्यान्न भंडार मौजूद है और खाद्य सुरक्षा को लेकर फिलहाल किसी बड़े संकट की आशंका नहीं है।
मौसम विभाग का पूर्वानुमान
भारतीय मौसम विभाग के दीर्घकालिक अनुमान के अनुसार जून से सितंबर 2026 के दौरान देश में मानसूनी वर्षा दीर्घकालिक औसत का लगभग 90 प्रतिशत रह सकती है। यह सामान्य से कम वर्षा का संकेत है। उत्तर-पश्चिम भारत, मध्य भारत और दक्षिण भारत के कई हिस्सों में बारिश की कमी देखी जा सकती है। साथ ही तापमान सामान्य से अधिक रहने की संभावना भी जताई गई है। कम बारिश और बढ़ती गर्मी का यह दोहरा दबाव कृषि क्षेत्र के लिए गंभीर चुनौती बन सकता है।
इन फसलों पर पड़ेगा सबसे बड़ा असर
– कमजोर मानसून का सबसे अधिक असर उन फसलों पर पड़ता है जो वर्षा आधारित खेती पर निर्भर हैं। इनमें धान सबसे महत्वपूर्ण फसल है। भारत दुनिया के प्रमुख चावल उत्पादक देशों में शामिल है और यहां धान की खेती बड़े पैमाने पर मानसूनी वर्षा पर निर्भर करती है।
– यदि बारिश में कमी आती है तो धान उत्पादन प्रभावित हो सकता है, जिसका असर घरेलू बाजार से लेकर निर्यात तक दिखाई दे सकता है। इसके अलावा मक्का, अरहर, उड़द, मूंग, सोयाबीन और मूंगफली जैसी खरीफ फसलें भी संकट का सामना कर सकती हैं।
– विशेषज्ञों का मानना है कि यदि मानसून कमजोर रहा तो किसानों की लागत बढ़ेगी, उत्पादन घटेगा और ग्रामीण आय पर दबाव बढ़ सकता है।
जलवायु परिवर्तन ने बढ़ाई मुश्किल
विशेषज्ञों का कहना है कि इस बार स्थिति पहले की तुलना में अधिक जटिल है। जलवायु परिवर्तन के कारण पृथ्वी का औसत तापमान लगातार बढ़ रहा है। ऐसे में अल नीनो का प्रभाव और अधिक तीव्र हो सकता है। इसका असर केवल कृषि उत्पादन तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पशुपालन, ग्रामीण रोजगार, जल संसाधनों और खाद्य सुरक्षा पर भी दिखाई दे सकता है। कम बारिश के कारण पशुओं के लिए चारे की उपलब्धता प्रभावित हो सकती है, जिससे दूध उत्पादन और पशुधन आधारित आय पर असर पड़ सकता है।
खाद्य वस्तुओं की कीमतों पर असर
यदि फसल उत्पादन प्रभावित होता है तो सबसे पहले असर खाद्य वस्तुओं की कीमतों पर दिखाई देगा। दालें, खाद्य तेल, सब्जियां और अनाज महंगे हो सकते हैं। इससे आम परिवारों के मासिक बजट पर अतिरिक्त बोझ पड़ सकता है। अर्थशास्त्रियों का मानना है कि यदि कमजोर मानसून के साथ वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में भी व्यवधान बना रहता है, तो आने वाले महीनों में महंगाई बढ़ सकती है। इसका असर उपभोक्ताओं के साथ-साथ उद्योगों और बाजारों पर भी पड़ सकता है।
देश की नजरें मानसून की प्रगति पर टिकी
Drought Risk India: फिलहाल देश की नजरें मानसून की प्रगति पर टिकी हैं। यदि बारिश सामान्य से कम रहती है तो कृषि उत्पादन, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और खाद्य कीमतों पर दबाव बढ़ना तय है। हालांकि सरकार ने संभावित संकट से निपटने की तैयारी शुरू कर दी है, लेकिन अंतिम तस्वीर आने वाले महीनों में मानसून के प्रदर्शन से ही साफ होगी। कहना गलत नहीं होगा कि इस बार मानसून की हर बूंद केवल खेतों के लिए ही नहीं, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था और करोड़ों लोगों की आजीविका के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण साबित होने वाली है।

