चांद के इशारे पर नहीं नाचता समुद्र!, 10 मीटर तक उठता है ज्वार

कहीं समुद्र 10 मीटर से ज्यादा ऊपर उठता है तो कहीं ज्वार मामूली रहता है। जानिए इसके पीछे चांद, समुद्र की बनावट और बदलती जलवायु का क्या असर है।
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गर्म होती धरती ने बदल दिया पूरा खेल
समुद्र में ज्वार-भाटा सिर्फ चंद्रमा और सूर्य के गुरुत्वाकर्षण का खेल नहीं है। समुद्र की गहराई, तट की बनावट और समुद्र के भीतर बनने वाली तरंगें भी तय करती हैं कि किसी जगह ज्वार कितना ऊंचा उठेगा। अब जलवायु परिवर्तन के कारण गर्म होते महासागर और बढ़ता समुद्र स्तर इस प्राकृतिक प्रक्रिया को भी प्रभावित कर रहे हैं।
दुनिया के कुछ हिस्सों में समुद्र का जलस्तर ज्वार के दौरान मामूली रूप से ऊपर-नीचे होता है, जबकि कुछ जगहों पर हाई टाइड और लो टाइड के बीच कई मीटर का अंतर देखने को मिलता है। पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया के किम्बर्ली तट पर यह अंतर 10 मीटर से भी अधिक हो सकता है। कनाडा की बे ऑफ फंडी में ज्वारीय अंतर करीब 16 मीटर तक पहुंच सकता है। आखिर एक ही ग्रह पर समुद्र के ज्वार में इतना बड़ा अंतर क्यों है? वैज्ञानिकों के अनुसार, इसका जवाब केवल चंद्रमा के गुरुत्वाकर्षण में नहीं छिपा है।
चंद्रमा का गुरुत्वाकर्षण सबसे बड़ा कारक
पृथ्वी पर समुद्री ज्वार मुख्य रूप से चंद्रमा और सूर्य के गुरुत्वाकर्षण से बनते हैं। सूर्य चंद्रमा से बहुत अधिक विशाल है, लेकिन वह पृथ्वी से बहुत दूर है। इसके विपरीत चंद्रमा पृथ्वी के काफी करीब है, इसलिए समुद्री ज्वार पर उसका प्रभाव ज्यादा होता है। चंद्रमा का गुरुत्वाकर्षण पृथ्वी के हर हिस्से पर समान नहीं होता।
पृथ्वी के चंद्रमा की ओर वाले हिस्से पर इसका प्रभाव अधिक होता है, जबकि दूसरी ओर इसका प्रभाव अपेक्षाकृत कम रहता है। पानी चट्टानों की तुलना में ज्यादा आसानी से गतिशील होता है, इसलिए यह अंतर समुद्र में ज्वारीय उभार के रूप में स्पष्ट दिखाई देता है। पृथ्वी के घूमने के साथ अलग-अलग क्षेत्र इन ज्वारीय उभारों से गुजरते हैं। इसी वजह से दुनिया के कई हिस्सों में एक दिन में दो हाई टाइड और दो लो टाइड देखने को मिलती हैं।
सूर्य भी बदलता है ज्वार की ताकत
सूर्य भी पृथ्वी पर ज्वार पैदा करता है। जब सूर्य, चंद्रमा और पृथ्वी लगभग एक सीध में होते हैं, तो दोनों के गुरुत्वाकर्षण प्रभाव एक-दूसरे को मजबूत करते हैं। इस स्थिति को स्प्रिंग टाइड कहा जाता है। इसमें हाई टाइड और लो टाइड के बीच अंतर सामान्य से ज्यादा होता है। इसके उलट जब सूर्य और चंद्रमा पृथ्वी से देखने पर लगभग समकोण पर होते हैं, तो दोनों के प्रभाव आंशिक रूप से एक-दूसरे को कम करते हैं। इसे नीप टाइड कहा जाता है और इस दौरान ज्वारीय अंतर अपेक्षाकृत कम होता है।

समुद्र की भौगोलिक बनावट करती है बड़ा फर्क
वास्तविक समुद्र में ज्वार का व्यवहार उस सरल तस्वीर से काफी अलग है जिसमें पानी को केवल दो बड़े उभारों के रूप में देखा जाता है। महाद्वीप महासागरों को अलग-अलग बेसिन में बांटते हैं और पानी इन बेसिनों के भीतर अलग-अलग तरीके से घूमता है। कई समुद्री बेसिनों में ऐसे बिंदु होते हैं जहां ज्वार के कारण समुद्र के स्तर में बदलाव लगभग नहीं होता। इन्हें अम्फिड्रोमिक पॉइंट्स कहा जाता है। इन बिंदुओं से दूर जाने पर ज्वारीय अंतर आमतौर पर बढ़ता जाता है। तट की आकृति भी ज्वार को काफी बढ़ा सकती है। इसका एक महत्वपूर्ण कारण रेजोनेंस है।
हर खाड़ी और समुद्री बेसिन की अपनी प्राकृतिक लय होती है। जब यह लय स्थानीय ज्वार की लय से मेल खाती है, तो पानी की हर अगली गति पिछली गति को और मजबूत कर देती है। इसी तरह की प्रक्रिया पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया के किम्बर्ली तट और कनाडा की Bay of Fundy में बड़े ज्वार के पीछे महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
समुद्र के नीचे छिपे पहाड़ भी हैं जिम्मेदार
ज्वार को प्रभावित करने वाली एक और महत्वपूर्ण चीज समुद्र की तलहटी है। समुद्र के भीतर मौजूद पहाड़, रिज और असमान सतह जब ज्वारीय प्रवाह के रास्ते में आते हैं तो ज्वार की कुछ ऊर्जा समुद्र के भीतर बनने वाली तरंगों में बदल जाती है। इन्हें इंटरनल टाइड्स कहा जाता है। इंडोनेशियाई द्वीपसमूह का जटिल समुद्री तल ऐसी शक्तिशाली आंतरिक ज्वारीय तरंगों का निर्माण करता है। जब ये तरंगें टूटती हैं तो समुद्र में मिश्रण बढ़ सकता है, जिससे गर्मी और पोषक तत्वों के वितरण में मदद मिलती है।
कुछ आंतरिक ज्वारीय तरंगें अपने बनने की जगह के आसपास ही टूट जाती हैं, जबकि कुछ हजारों किलोमीटर तक यात्रा कर सकती हैं। इस दौरान वे सतही ज्वार की ऊर्जा को प्रभावित करती हैं। उनका प्रभाव कभी ज्वार को धीमा करने वाले ब्रेक जैसा और कभी स्प्रिंग जैसा हो सकता है, जो ऊर्जा को एक चरण में लेकर दूसरे चरण में वापस देता है।
अब जलवायु परिवर्तन भी बदल रहा है ज्वार का स्वरूप
वैज्ञानिकों के मुताबिक, ज्वार कोई पूरी तरह स्थिर प्राकृतिक प्रक्रिया नहीं है। जलवायु परिवर्तन के कारण समुद्र का स्तर बढ़ रहा है, तटरेखाएं बदल रही हैं और ऊपरी महासागर गर्म हो रहा है। साथ ही समुद्र में स्ट्रैटिफिकेशन यानी अलग-अलग तापमान और घनत्व वाली परतों का विभाजन बढ़ रहा है। इन बदलावों का असर ज्वार के आकार और उसकी ऊर्जा के वितरण पर पड़ सकता है। वैज्ञानिकों को पहले से ऐसे माप मिले हैं जो कुछ क्षेत्रों में ज्वारीय बदलाव का संकेत देते हैं। बेहतर समुद्री मॉडल और नए उपग्रह अब उन जटिल तटीय क्षेत्रों में भी ज्वार को मापने में मदद कर रहे हैं, जहां पहले अंतरिक्ष से निगरानी करना मुश्किल था।
बढ़ते ज्वार का मतलब बढ़ सकता है बाढ़ का खतरा
ज्वार में बदलाव का असर सिर्फ समुद्र विज्ञान तक सीमित नहीं है। तटीय इलाकों में रहने वाले लोगों के लिए इसका सीधा संबंध बाढ़ के जोखिम से है। ऑस्ट्रेलिया के विक्टोरिया राज्य में स्थित Lakes Entrance इसका एक उदाहरण है। वहां ज्वारीय सीमा में बदलाव को बढ़ती बाढ़ के प्रमुख कारणों में बताया गया है। स्थानीय प्रशासन घरों और कारोबारों की सुरक्षा के लिए ड्रेनेज व्यवस्था में सुधार की योजना पर काम कर रहा है। भविष्य में ज्वार किस तरह बदल सकते हैं, इसका बेहतर अनुमान तटीय समुदायों को बाढ़ के जोखिम के लिए तैयार होने, नुकसान कम करने और सुरक्षित तटीय विकास की योजना बनाने में मदद कर सकता है।
करीब तीन सदियों पहले आइजैक न्यूटन ने गुरुत्वाकर्षण के जरिए ज्वार को समझाने की वैज्ञानिक नींव रखी थी। लेकिन आज वैज्ञानिकों के सामने एक नया सवाल है-जब महासागर खुद बदल रहे हैं, तो क्या उनके ज्वार भी बदलेंगे? शोध से संकेत मिलता है कि इसका जवाब हां हो सकता है। चंद्रमा और सूर्य ज्वार के मूल चालक जरूर हैं, लेकिन समुद्र की बदलती भौतिक और जलवायु परिस्थितियां यह तय कर सकती हैं कि भविष्य में दुनिया के अलग-अलग तटीय क्षेत्रों में ज्वार किस रूप में दिखाई देगा।

