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विकास की रफ्तार बनाए रखने का दावा: वित्त मंत्री का आत्मविश्वास और जमीनी सच्चाई

विकास की रफ्तार बनाए रखने का दावा: वित्त मंत्री का आत्मविश्वास और जमीनी सच्चाई
Budget 2026: 7 हाई-स्पीड ट्रेन, हर जिले में गर्ल्स हॉस्टल और 40 हजार करोड़ का निवेश (Image Credit: AIR)

वित्त मंत्री सीतारमण ने बताया सरकार अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए 12.2 लाख करोड़ का पूंजीगत निवेश कर रही है। टियर 2-3 शहरों, इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग और दुर्लभ खनिज गलियारों पर फोकस। लेकिन महंगाई, बेरोजगारी जैसे तात्कालिक मुद्दों पर स्पष्टता की कमी।

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Gangesh Kumar
Gangesh Kumar
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बजट पेश करने के बाद वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में जो बातें कहीं, उनमें आत्मविश्वास और दृढ़ संकल्प का भाव था। उन्होंने दावा किया कि सरकार अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए रास्ता बना रही है और विकास की रफ्तार बनाए रखने के लिए ठोस कदम उठा रही है। 12.2 लाख करोड़ रुपये का पूंजीगत व्यय, संरचनात्मक सुधार, तकनीक को बढ़ावा और टियर 2-3 शहरों पर फोकस – ये सब सुनने में बेहद प्रभावशाली लगता है। लेकिन क्या यह सब धरातल पर उतरकर आम आदमी की जिंदगी में बदलाव लाएगा? आइए, इन दावों की पड़ताल करें।

पूंजीगत व्यय का रिकॉर्ड दावा

वित्त मंत्री ने बताया कि इस बार कुल पूंजीगत व्यय 12.2 लाख करोड़ रुपये है, जो सकल घरेलू उत्पाद का 4.4 प्रतिशत है और यह पिछले 10 वर्षों में सबसे अधिक है। यह आंकड़ा निश्चित रूप से बड़ा है और इससे बुनियादी ढांचे के विकास को गति मिल सकती है।

लेकिन यहां कुछ सवाल उठते हैं। पिछले बजटों में भी भारी-भरकम आवंटन की घोषणाएं हुई थीं, लेकिन वास्तविक खर्च कितना हुआ? कई बार बजट में राशि का प्रावधान तो हो जाता है, लेकिन वित्तीय वर्ष के अंत तक वह पूरी तरह खर्च नहीं हो पाती। क्या इस बार सरकार ने इस समस्या से निपटने के लिए कोई तंत्र विकसित किया है?

राजकोषीय घाटे का लक्ष्य

वित्त मंत्री ने कहा कि राजकोषीय घाटा 2026-27 में जीडीपी का 4.3 प्रतिशत रहने की उम्मीद है, जो चालू वित्त वर्ष के अनुमानित 4.4 प्रतिशत से कम है। यह आर्थिक अनुशासन की दिशा में सकारात्मक संकेत है।

लेकिन राजकोषीय घाटे को नियंत्रित करने का प्रयास करते हुए क्या सामाजिक क्षेत्रों – शिक्षा, स्वास्थ्य, सामाजिक सुरक्षा – पर खर्च में कटौती तो नहीं हुई? अक्सर घाटे को कम करने के चक्कर में जरूरी सामाजिक योजनाओं पर असर पड़ता है। क्या इस बार इस संतुलन का ध्यान रखा गया है?

तकनीक को बढ़ावा देने का संकल्प

वित्त मंत्री ने कहा कि 21वीं सदी पूरी तरह तकनीक से संचालित है और सरकार यह सुनिश्चित करेगी कि तकनीक का लाभ आम आदमी तक पहुंचे। यह बयान बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि तकनीक अब विकास का प्रमुख माध्यम बन गई है।

लेकिन सवाल यह है कि तकनीक का लाभ आम आदमी तक कैसे पहुंचेगा? डिजिटल डिवाइड – यानी तकनीक तक पहुंच में असमानता – आज भी एक बड़ी समस्या है। ग्रामीण क्षेत्रों में इंटरनेट की धीमी गति, स्मार्टफोन की अनुपलब्धता, डिजिटल साक्षरता की कमी – ये सब चुनौतियां हैं।

डिजिटल इंडिया की हकीकत

डिजिटल इंडिया की घोषणा हुए कई साल हो गए, लेकिन आज भी देश के बड़े हिस्से में बुनियादी इंटरनेट सुविधाएं नहीं हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में बैंकिंग, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं के डिजिटलीकरण की बात तो होती है, लेकिन बुजुर्ग और कम पढ़े-लिखे लोगों के लिए यह कितना सुलभ है?

जब सरकारी योजनाओं का लाभ लेने के लिए आधार, मोबाइल नंबर, ओटीपी और ऐप की जरूरत पड़ती है, तो जो लोग इन तकनीकों से परिचित नहीं हैं, वे पीछे रह जाते हैं। क्या तकनीक को बढ़ावा देने के साथ-साथ डिजिटल साक्षरता पर भी ध्यान दिया जा रहा है?

टियर 2 और टियर 3 शहरों पर फोकस

वित्त मंत्री ने बताया कि प्रति शहर प्रति वर्ष 1000 करोड़ रुपये दिए जा रहे हैं और जोर टियर 2 और टियर 3 शहरों पर होगा। यह स्वागत योग्य कदम है क्योंकि अब तक विकास मुख्य रूप से महानगरों तक सीमित रहा है।

छोटे शहरों में संभावनाएं बहुत हैं। यहां जमीन और श्रम सस्ता है, प्रतिभा भी है, लेकिन बुनियादी ढांचे की कमी है। अगर इन शहरों को विकसित किया जाए तो महानगरों पर दबाव कम होगा और क्षेत्रीय संतुलन बेहतर होगा।

कौन से शहर होंगे शामिल?

लेकिन यहां सवाल यह है कि कौन से शहरों को इस योजना में शामिल किया जाएगा? क्या चयन की प्रक्रिया पारदर्शी होगी? अक्सर ऐसी योजनाओं में राजनीतिक प्राथमिकताएं हावी हो जाती हैं और जरूरतमंद शहर छूट जाते हैं।

1000 करोड़ रुपये प्रति शहर एक अच्छी राशि है, लेकिन क्या इसका उपयोग सही तरीके से होगा? क्या स्थानीय निकायों को योजना बनाने और क्रियान्वयन में भागीदारी मिलेगी? क्या जनता की राय ली जाएगी कि किन क्षेत्रों में विकास की सबसे ज्यादा जरूरत है?

इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्र में आत्मनिर्भरता

40,000 करोड़ रुपये की इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट मैन्युफैक्चरिंग योजना को वित्त मंत्री ने भारत को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में बड़ा प्रोत्साहन बताया। वैश्विक स्तर पर जब आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान आ रहा है और चीन पर निर्भरता कम करने की जरूरत महसूस हो रही है, तब यह कदम महत्वपूर्ण है।

लेकिन इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग में सिर्फ पैसा लगाना काफी नहीं है। इसके लिए तकनीकी कौशल, अनुसंधान और विकास, गुणवत्ता नियंत्रण और वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धा करने की क्षमता चाहिए।

कुशल मानव संसाधन की कमी

भारत में इंजीनियरों की कोई कमी नहीं है, लेकिन क्या उनके पास वह कौशल है जो इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग के लिए जरूरी है? हमारी शिक्षा व्यवस्था सैद्धांतिक ज्ञान पर ज्यादा जोर देती है, व्यावहारिक प्रशिक्षण पर कम।

उद्योगों को शिकायत रहती है कि उन्हें फ्रेश ग्रेजुएट्स को फिर से प्रशिक्षित करना पड़ता है। क्या बजट में शिक्षा और उद्योग के बीच की इस खाई को पाटने के लिए कोई प्रावधान है?

दुर्लभ खनिज गलियारे की योजना

दुर्लभ खनिज गलियारे स्थापित करने की घोषणा रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है। दुर्लभ खनिज इलेक्ट्रॉनिक्स, बैटरी, रक्षा उपकरण और अन्य उच्च तकनीक उत्पादों के लिए जरूरी हैं। अभी भारत इनके लिए काफी हद तक आयात पर निर्भर है।

वित्त मंत्री ने कहा कि रक्षा गलियारों की सफलता को देखते हुए दुर्लभ खनिज गलियारे भी भारतीय अर्थव्यवस्था में बड़ा बदलाव लाएंगे। यह आशावाद स्वागत योग्य है, लेकिन जमीनी चुनौतियां भी कम नहीं हैं।

खनन की पर्यावरणीय चुनौतियां

खनन का पर्यावरण पर गहरा असर पड़ता है। जंगलों की कटाई, जल प्रदूषण, वायु प्रदूषण, स्थानीय समुदायों का विस्थापन – ये सब समस्याएं खनन से जुड़ी हैं। क्या दुर्लभ खनिज गलियारे विकसित करते समय पर्यावरण संरक्षण और स्थानीय समुदायों के हितों का ध्यान रखा जाएगा?

अक्सर खनन परियोजनाओं में स्थानीय लोगों की भागीदारी नहीं होती और उन्हें फायदा भी नहीं मिलता। क्या इस बार सरकार ने इस मुद्दे पर सोचा है?

संरचनात्मक सुधारों का दावा

वित्त मंत्री ने कहा कि सरकार संरचनात्मक सुधारों के साथ पारिस्थितिकी तंत्र बना रही है, ताकि उत्पादकता और रोजगार के अवसर बेहतर हों। यह दीर्घकालीक दृष्टिकोण सही है क्योंकि टिकाऊ विकास के लिए संरचनात्मक सुधार जरूरी हैं।

लेकिन संरचनात्मक सुधार अक्सर समय लेते हैं और इनका असर तुरंत नहीं दिखता। जब तक ये सुधार प्रभावी होंगे, तब तक आम आदमी महंगाई, बेरोजगारी और अन्य समस्याओं से जूझता रहेगा। क्या तात्कालिक राहत के लिए कोई उपाय नहीं होना चाहिए?

रोजगार सृजन की असली तस्वीर

रोजगार के अवसर बढ़ाने की बात तो होती है, लेकिन गुणवत्तापूर्ण, स्थायी रोजगार कितने पैदा हो रहे हैं? अस्थायी नौकरियां, ठेके पर काम, कम वेतन – ये युवाओं को सुरक्षा नहीं दे सकते।

आंकड़ों में भले ही रोजगार सृजन दिखे, लेकिन हकीकत यह है कि लाखों युवा अच्छी नौकरी की तलाश में भटक रहे हैं। सरकारी नौकरियों में भर्ती की प्रक्रिया धीमी है, निजी क्षेत्र में भी नए अवसर सीमित हैं।

आम आदमी के लिए क्या?

वित्त मंत्री की प्रेस कॉन्फ्रेंस में बड़ी-बड़ी घोषणाओं, आंकड़ों और दीर्घकालीन योजनाओं की बात हुई। लेकिन आम आदमी के लिए क्या है? महंगाई से राहत, आयकर में छूट, रोजगार की गारंटी, बेहतर स्वास्थ्य और शिक्षा सुविधाएं – इन मुद्दों पर स्पष्टता नहीं दिखी।

जब एक मध्यम वर्गीय परिवार रोज महंगाई की मार झेल रहा है, जब एक युवा डिग्री लेकर भी बेरोजगार है, जब एक किसान अपनी फसल का उचित दाम नहीं पा रहा, तो उन्हें 12.2 लाख करोड़ के पूंजीगत व्यय से कैसे राहत मिलेगी?

मध्यम वर्ग की उपेक्षा

मध्यम वर्ग, जो देश की अर्थव्यवस्था का आधार है, हमेशा बजट से कुछ राहत की उम्मीद करता है। लेकिन इस बार भी उसे निराशा हाथ लगी। आयकर में कोई बड़ी राहत नहीं, रोजमर्रा की चीजों की कीमतों में कमी के कोई संकेत नहीं।

शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास – इन सब पर खर्च लगातार बढ़ रहा है, लेकिन आय उसी अनुपात में नहीं बढ़ रही। इससे मध्यम वर्ग पर आर्थिक दबाव बढ़ता जा रहा है।

पारदर्शिता और जवाबदेही का सवाल

किसी भी योजना की सफलता उसके क्रियान्वयन पर निर्भर करती है। बड़ी घोषणाएं करना आसान है, लेकिन उन्हें जमीन पर उतारना और उनका लाभ आम आदमी तक पहुंचाना असली चुनौती है।

क्या सरकार ने इन योजनाओं के क्रियान्वयन के लिए कोई पारदर्शी तंत्र विकसित किया है? क्या नियमित निगरानी और मूल्यांकन की व्यवस्था होगी? क्या जनता को इन योजनाओं की प्रगति की जानकारी मिलेगी?

भ्रष्टाचार पर लगाम

बड़ी परियोजनाओं में भ्रष्टाचार की संभावना हमेशा रहती है। ठेकेदारों, नौकरशाहों और राजनेताओं की मिलीभगत से अक्सर परियोजनाओं की लागत बढ़ जाती है और गुणवत्ता खराब हो जाती है।

क्या इस बार सरकार ने भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने के लिए कोई विशेष कदम उठाया है? टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल, पारदर्शी टेंडर प्रक्रिया, सख्त निगरानी – ये सब जरूरी हैं।


वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण की प्रेस कॉन्फ्रेंस में आत्मविश्वास और दृढ़ संकल्प झलका। 12.2 लाख करोड़ रुपये का पूंजीगत व्यय, तकनीक को बढ़ावा, टियर 2-3 शहरों पर फोकस, इलेक्ट्रॉनिक्स में आत्मनिर्भरता और दुर्लभ खनिज गलियारे – ये सब महत्वाकांक्षी योजनाएं हैं।

लेकिन महत्वाकांक्षी घोषणाओं और जमीनी हकीकत के बीच अक्सर बड़ा अंतर होता है। आम आदमी की समस्याएं – महंगाई, बेरोजगारी, स्वास्थ्य, शिक्षा – इन पर ठोस समाधान नहीं दिखे।

विकास की गति बनाए रखने का दावा तभी सार्थक होगा जब वह समावेशी हो, जब हर वर्ग और हर क्षेत्र को उसका लाभ मिले। बुनियादी ढांचे में निवेश जरूरी है, लेकिन साथ ही मानव विकास, सामाजिक सुरक्षा और आर्थिक न्याय पर भी बराबर ध्यान देना चाहिए।

उम्मीद करते हैं कि ये घोषणाएं केवल कागजों पर न सिमटें, बल्कि वास्तव में देश की तस्वीर बदलने में योगदान दें। लेकिन इसके लिए जरूरी होगा कि सरकार पारदर्शिता, जवाबदेही और जनता की भागीदारी सुनिश्चित करे।


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